मिथ्या साक्ष्य देना एवं मिथ्या साक्ष्य गढ़ना क्या है? दोनों में क्या अंतर है?

मिथ्या साक्ष्य देना एवं मिथ्या साक्ष्य गढ़ना क्या है? दोनों में क्या अंतर है?

मिथ्या साक्ष्य देना

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 191 में मिथ्या साक्ष्य के अपराध की परिभाषा दी गयी है. यदि कोई व्यक्ति शपथ द्वारा सत्य कथन करने के लिए बाध्य होता है फिर भी वह साशय असत्य कथन करता है या वह अपने कथन की सत्यता में विश्वास न करते हुए सत्य के रूप में कथन करता है तो वह ‘मिथ्या साक्ष्य’ के अपराध का दोषी होगा. मिथ्या साक्ष्य में कथन मौखिक, लिखित या आचरण से भी किया जा सकता है.

उदाहरण के लिए, ‘अ’ तथा ‘ब’ के बीच कोई वाद चल रहा है. ‘स’ शपथपूर्वक साक्ष्य देता है कि ‘अ’ के द्वारा किया गया वाद सत्य है जबकि वाद के बारे में ‘स’ को जानकारी नहीं होती है. ‘स’ मिथ्या साक्ष्य देने का अपराधी है.

मिथ्या साक्ष्य के आवश्यक तत्व

  1. किसी व्यक्ति का शपथ द्वारा या विधि के किन्हीं उपबन्धों द्वारा सत्य कथन करने के लिए बाध्य होना,
  2. व्यक्ति द्वारा मिथ्या कथन करना,
  3. मिथ्या कथन करने वाले व्यक्ति को ध्यान होना कि वह असत्य कह रहा है या उसे अपने द्वारा कहे गये कथन के बारे में विश्वास नहीं होना चाहिए.

अंग्रेजी विधि में मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध को ‘परजूरी’ कहते हैं.

मिथ्या साक्ष्य के अपराध के लिए यह आवश्यक है कि मिथ्या साक्ष्य एक ऐसी कार्यवाही में दिया गया है जिसमें विधिक रूप से सत्य कथन करने के लिए आबद्ध हो.

बबन सिंह बनाम जगदीश सिंह, AIR 1967 SC 68 के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि न्यायालय के समक्ष एक कार्यवाही में गवाह द्वारा झूठी शपथ ली जाती है तो उसके द्वारा किया अपराध धारा 191 तथा 192 के अन्तर्गत आयेगा |

मिथ्या साक्ष्य गढ़ना

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 192 के अनुसार, जो कोई साशय किसी परिस्थिति को अस्तित्व में लाता है, या किसी पुस्तक या अभिलेख या इलेक्ट्रानिक अभिलेख में झूठी प्रविष्टि करता है या मिथ्या कथन का दस्तावेज अभिलेख या इलेक्ट्रानिक अभिलेख बनाता है ताकि ऐसी परिस्थिति, प्रविष्टि या दस्तावेज न्यायिक कार्यवाही या;

लोकसेवक या मध्यस्थ के सामने होने वाली कार्यवाही में साक्ष्य के काम में आ जाय और ऐसे साक्ष्य में दर्शित होने पर ऐसी परिस्थिति, मिथ्या प्रविष्टि या मिथ्या कथन के कारण कोई व्यक्ति, जिसे ऐसी कार्यवाही में साक्ष्य के आधार पर राय कायम करनी है ऐसो कार्यवाही के परिणाम के लिए तात्विक किसी बात के सम्बन्ध में गलत राय बनाये, वह मिथ्या साक्ष्य गढ़ता (Fabricating False Evidence) है, कहा जाता है.

उदाहरण के लिए, ‘अ’, ‘ब’ के मकान में अफीम रख देता है, बाद में पुलिस को सूचना देता है कि ‘अ’ एक तस्कर है. यहाँ ‘अ’ एक मिथ्या-साक्ष्य गढ़ने का दोषी होगा.

अपराध विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में एक नई धारा 195A के द्वारा यह उपबंधित किया गया कि-

  1. यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति या उसमें हित रखने वाले किसी व्यक्ति को मिथ्या साक्ष्य देने के लिए उसकी शरीर, ख्याति या सम्पति को नुकसान पहुँचाने की धमकी देगा तो उसे 7 वर्ष की अवधि के कारावास या जुर्माना से या दोनों से दण्डित किया जायेगा.
  2. यदि ऐसी मिथ्या साक्ष्य के आधार पर किसी निर्दोष व्यक्ति को मृत्युदण्ड अथवा 7 वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दण्डित किया जाता है तो मिथ्या साक्ष्य देने वाले व्यक्ति को उसी रीति से और उस सीमा तक दण्डित किया जायेगा जिस रीति से एवं सीमा एक निर्दोष व्यक्ति को दण्डित किया जाता है.

मिथ्या साक्ष्य गढ़ने के आवश्यक तत्व

  1. साशय कोई परिस्थिति उत्पन्न करना,
  2. किसी पुस्तक या अभिलेख में प्रविष्टि करना,
  3. किसी झूठे कथन का दस्तावेज तैयार करना,
  4. परिस्थिति, प्रविष्टि या दस्तावेज तैयार करने का आशय साक्ष्य के रूप में काम में लेने का होना,
  5. साक्ष्य किसी न्यायिक कार्यवाही या लोकसेवक या मध्यस्थ के समक्ष किसी कार्यवाही में प्रयोग करने के लिए होना,
  6. ऐसा करने का आशय कार्यवाही में निर्णय देने वाले की राय पर प्रभाव डालने का होना.

महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड बनाम दातार स्विच गियर लिमिटेड, (2011) 1 Cr. L. I. 8 (SC) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि न तो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 192 और न तो 199 में ही प्रतिनिहित दायित्व का सिद्धान्त समाविष्ट है. अतः शिकायतकर्ता के लिये यह आवश्यक है कि वह अपनी शिकायत में प्रत्येक अपराधी के रोल के विषय में स्पष्ट उल्लेख करे.

मिथ्या साक्ष्य जो तैयार किया जाता है, सुसंगत होना चाहिये अन्यथा साक्ष्य गढ़ने का अपराध नहीं होगा. मीर एकरार अली (1830, 6 कलकत्ता 482) के मामले में अपराधी किसी दस्तावेज को पंजीकृत करवाना चाहता था किन्तु निर्धारित किया गया था. इसलिये अभियुक्त ने दस्तावेज के निष्पादन के दिनांक में परिवर्तन कर दिया. न्यायालय ने उसे मिथ्या साक्ष्य गढ़ने के अपराध का दोषी पाया.

सेना न्यायालय के समक्ष विचारण भी न्यायिक कार्यवाही होती है. अतः ऐसे न्यायालय के समक्ष की गई कार्यवाही में मिथ्या साक्ष्य गढ़ना भी दण्डनीय होगा |

मिथ्या साक्ष्य देना एवं मिथ्या साक्ष्य गढ़ना में अन्तर

  1. मिथ्या साक्ष्य (False Evidence) उस व्यक्ति द्वारा दिया जाता है जो शपथपूर्वक विधि के किसी अन्य प्रावधान द्वारा ऐसा करने के लिए बाध्य है, जबकि मिथ्या साक्ष्य गढ़ने (Fabricating False Evidence) में इस प्रकार की कोई बाध्यता नहीं होती.
  2. मिथ्या साक्ष्य के लिये सामान्य आशय होना पर्याप्त है, जबकि मिथ्या साक्ष्य गढ़ने के लिये विशेष आशय होता है.
  3. मिथ्या साक्ष्य में कोई तत्वपूर्ण विचार होना आवश्यक नहीं है, जबकि मिथ्या साक्ष्य गढ़ने के लिए तत्वपूर्ण विचार विषय होना चाहिए.
  4. मिथ्या साक्ष्य में निर्णय देने वाले पर भ्रमपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता, जबकि मिथ्या साक्ष्य गढ़ने में निर्णायक पर भ्रमपूर्ण प्रभाव पड़ता है.
  5. मिथ्या साक्ष्य में किसी कानूनी कार्यवाही के दौरान किया जाता है, जबकि मिथ्या साक्ष्य गढ़ने के लिए न्यायिक कार्यवाही होना आवश्यक नहीं है |

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