भारतीय दंड संहिता की धारा 100 | आईपीसी 100 धारा क्या है? | IPC 100 In Hindi

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भारतीय दंड संहिता की धारा 100 | आईपीसी 100 धारा क्या है? | IPC 100 In Hindi

IPC की धारा 100

IPC की धारा 100 के तहत, किसी व्यक्ति को अपने शरीर की सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है. इस धारा के अनुसार, शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का विस्तार, पूर्ववर्ती धारा में उल्लिखित निर्बंधों के अधीन होता है. इसे हमलावर की स्वेच्छाया मृत्यु कारित करने या कोई अन्य अपहानि करने तक मिलता है, अगर उस अपराध के कारण इस अधिकार का प्रयोग करने का अधिकार पैदा होता है. यहां तक कि यह धारा उस समय तक प्रभावी रहती है जब तक कि व्यक्ति अपनी रक्षा के लिए आत्मघाती या दूसरों को हानि पहुंचाने वाले हमले की आशंका में है.

धारा 100 में क्या है? इस धारा के अंतर्गत, यदि कोई व्यक्ति आत्मरक्षा के लिए किसी को मारने का विचार करता है और इसे स्वयं को बचाने के लिए आवश्यक समझता है, तो उसे इस धारा के अधीन हत्या की आज्ञा मिलती है, जिसे अपराध के चरणों के तहत स्वीकृति कहा जाता है.

धारा 100 में उन छः परिस्थितियों का वर्णन करती है जिनमें प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक विस्तारित हो जाता है. वे परिस्थितियाँ निम्न हैं-

  1. ऐसा हमला जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो जाए कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम मृत्यु होगा.
    • सरल शब्दों में, यह स्थिति जिसमें यह आशंका हो कि किसी हमले का परिणाम मृत्यु हो सकता है, उसे “युक्तियुक्त रूप से हत्या की आशंका” कहा जाता है. इस आशंका की आधारिक युक्तियाँ यह हो सकती हैं कि व्यक्ति ने हमले का उद्देश्य किया है और इससे अन्यथा मृत्यु हो सकती है.
      • उदाहरण के लिए, ‘A’ ने ‘B’ को छुरा दिखाते हुए यह कहता है कि उसे अमुक धनराशि तत्काल प्रदान करे अन्यथा वह छुरे से उसकी हत्या कर देगा और ऐसा कहते ही वह हमला करने को तैयार हो जाता है. ऐसी अवस्था में ‘B’ को अपनी प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार ‘A’ की मृत्यु कारित करने तक विस्तारित हो जाता है.
  2. ऐसा हमला जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित होती हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम घोर उपहति होगा.
    • सरल शब्दों में, ऐसा हमला जिससे यह आशंका कारित होती है कि अन्यथा इससे घातक उपहति हो सकती है, उसे न्यायिक प्रणाली में आत्मरक्षा के रूप में माना जा सकता है. ऐसे मामलों में, व्यक्ति को अपनी रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार होता है.
  3. बलात्संग करने के आशय से किया गया हमला के विरुद्ध भी प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार मृत्यु कारित करने तक विस्तारित हो जाता है किन्तु इसके लिए बलात्संग अथवा बलात्संग के खतरे को साबित किया जाना आवश्यक होगा.
  4. प्रकृति विरुद्ध काम तृष्णा (या इच्छा की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संतुलन) की तृप्ति के आशय से किया गया हमला.
  5. अपहरण या व्यपहरण करने के आशय से किया गया हमला.
  6. इस आशय से किया गया हमला कि किसी व्यक्ति का ऐसी परिस्थितियों में सदोष परिरोध किया जाए, जिनसे उसे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो कि वह अपने को छुड़ाने के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त नहीं कर सकेगा तो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुए हमलावर की मृत्यु कारित कर सकता है.
  7. अम्ल फेंकने या देने का कृत्य, या अम्ल फेंकने या देने का प्रयास करना जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो कि ऐसे कृत्य के परिणाम स्वरूप अन्यथा घोर उपहति कारित होगी (दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम की धारा (2) द्वारा अन्तः स्थापित दिनांक 3 फरवरी, 2013 से प्रभावी.

धारा 100 के अंतर्गत ‘सदोष अवरोध‘ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है. अतः सदोष अवरोध करने के आशय से किए गए हमले के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग मृत्यु कारित करने तक विस्तारित नहीं होगा.

अत्यधिक दबाव या मजबूरी का उचित बोझ होने की स्थिति में भी प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार मृत्यु कारित कर देने तक विस्तृत हो जाता है.

इस धारा में प्रयुक्त ‘अपहरण’ शब्द की व्याख्या साधारण अपहरण के रूप में की गयी है. यह धारा 362 में परिभाषित अपहरण से कुछ विस्तृत अर्थ रखता है |

महत्वपूर्ण वाद

  1. विश्वनाथ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का वाद धारा 100 पर एक महत्वपूर्ण वाद है. इसमें पति अपने श्वसुर के घर से अपनी पत्नी को बाहर घसीट रहा था ताकि वह उसे उसकी सहमति के बिना अपने घर ले जा सके. तभी अपनी बहन को इस प्रकार घसीटा जाते हुए देखकर उसके भाई विश्वनाथ ने अपने बहनोई को चाकू से घायल कर दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी. इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णीत किया कि विश्वनाथ को वैयक्तिक प्रतिरक्षा का अधिकार था कि वह अपनी बहन को उसके पति के प्रहार से प्रतिरक्षा कर सके क्योंकि उसके पति का आशय बलपूर्वक उसका अपहरण करना था. इस प्रकार अपहरण के मामले प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार मृत्यु कारित करने तक विस्तारित होता है.
  2. प्रकाश चन्द्र बनाम राजस्थान राज्य 1991 के बलात्कार के आशय से किया गया हमला पर महत्वपूर्ण वाद है. इस प्रकरण में प्रकाश चन्द्र व उसके साथी को हत्या का दोषी नहीं माना गया और इन्हें IPC की धारा 100 का लाभ प्रदान किया गया.
  3. उत्तर प्रदेश राज्य बनाम चतुर सिंह 2006 SC के प्रकरण में अभियुक्त कुल्हाड़ी लेकर अपने भाई के घर गया और अपने भाई और भाभी को एक के बाद एक कर काट डाला. IPC की धारा 313 के अधीन परीक्षण के दौरान अभियुक्त ने पीटे जाने की बात नहीं कहा था, प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुए हत्या कारित करना नहीं कहा जा सकता है. अतः वह हत्या के लिए दोषसिद्ध किया गया |

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