मानव अधिकार का अर्थ, परिभाषा, महत्व, वर्गीकरण एवं विकास

मानव अधिकार का अर्थ, परिभाषा, महत्व, वर्गीकरण एवं विकास

मानव अधिकार का अर्थ

मानव अधिकार क्या है? मानव अधिकार वे न्यूनतम अधिकार हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक रूप से प्राप्त होना चाहिये क्योंकि वह मानव परिवार का सदस्य है. मानव अधिकारों की धारणा मानव गरिमा की धारणा से जुड़ी है. अतएव जो अधिकार मानव गरिमा को बनाये रखने के लिये आवश्यक हैं उन्हें मानव अधिकार कहा जा सकता है. इस प्रकार अधिकारों की धारणा आवश्यक रूप से न्यूनतम मानव आवश्यकताओं पर आधारित है. इनमें से कुछ मानव अधिकारों की संकल्पना उतनी ही पुरानी है जितनी कि प्राकृतिक विधि पर आधारित प्राकृतिक अधिकारों का प्राचीन सिद्धांत तथापि मानव अधिकारों पद की उत्पत्ति द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात अंतर्राष्ट्रीय चार्टरों और अन्तर्राष्ट्रीय विधि में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण विकास है. राज्यों के अतिरिक्त, व्यक्ति अन्तर्राष्ट्रीय विधि से व्युत्पन्न अधिकारों और कर्तव्यों से युक्त होने के कारण अन्तर्राष्ट्रीय विधि का विषय हो गया है. जबकि कतिपय नियम प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त स्थिति और कार्य-कलाप के विनियमन से सम्बन्धित हैं, कतिपय अन्य अप्रत्यक्ष रूप से उसे प्रभावित करते हैं.

मानव अधिकार की परिभाषा

मानवीय अधिकार या मानवाधिकार वास्तव में वे अधिकार हैं जो प्रत्येक मनुष्य को केवल इस आधार पर मिलते हैं कि उसे मनुष्य के रूप में जीवित रहने के लिये उन अधिकारों की आवश्यकता होती है.

मेरी रोविन्सन के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को उसकी मौलिक स्वतंत्रताओं को संरक्षा एवं उसे प्राप्त करने के व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त अधिकार मानवाधिकार कहलाते हैं.

मानवाधिकारों को प्राकृतिक अधिकार, मूल अधिकार, आधारभूत अधिकार (Basic Tights), अथवा अन्तर्निहित या जन्मजात अधिकार (Inherent Right) भी कहा जाता है. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 2 (घ) में मानव अधिकार को निम्न रूप से परिभाषित किया गया है-

मानव अधिकार से अभिप्राय संविधान द्वारा गारण्टीकृत तथा अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदाओं में सम्मिलित एवं भारत में न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय व्यक्तियों के जीवन, स्वतंत्रता, समानता, एवं गरिमा से है.

मानव अधिकार का महत्व

मानव अधिकार की जो स्थिति आज है, वह व्यक्तियों के राज्य की महतो शक्ति के विरुद्ध सदियों के संघर्ष का परिणाम है. आज यह माना जा रहा है कि निरंकुश राज्यों पर मानवाधिकारों से ही अंकुश लगाया जा सकता है. मानव अधिकार, वास्तव में हमारी प्रकृति जो हमारे दैनिक जीवन को नाना रूपों में प्रभावित करती है, के मूल तत्वों में है.

मानव अधिकार के महत्व का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के पश्चात जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई तो मानवाधिकार के सम्बर्द्धन और संरक्षण को इसने अपने प्रमुख उद्देश्यों में रखा. अपने आगे आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने मूल मानव ने अधिकारों के प्रति मानव की गरिमा और महत्व के प्रति अपनी निष्ठा की अभिपुष्टि की. मूलवंश, लिंग, भाषा या धर्म के आधार पर विभेद किए बिना सभी के लिए मानव अधिकारों और मूल स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान की अभिवृद्धि और उसे प्रोत्साहित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की कामना की.

मानवाधिकार समय के अनुक्रम में राजनैतिक और नैतिक संकल्पना ही नहीं रहा, वह एक विधिक संकल्पना भी है. यह आश्चर्यजनक बात नहीं है कि मानवाधिकार अब विकसित होते हुए विधिशास्त्रीय साहित्य की विषय वस्तु बन गया है. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद अब अधिकांश विद्वानों का मानना है कि मानवाधिकार व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध अधिकार प्रदान करते हैं. अन्त में हम यह कह सकते हैं कि मानव अधिकारों की संकल्पना इस धारणा पर आधारित है कि एक अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय है जो मानवाधिकारों को मान्यता प्रदान करता है और साथ ही राज्य के विरुद्ध उनके कार्यान्वयन की व्यवस्था भी करता है.

मानव अधिकार का वर्गीकरण

मानव अधिकार का वर्गीकरण लुईस बी० सोहन के अनुसार, मानवाधिकार को तीन प्रकारों या कोटियों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

1. प्रथम पीढ़ी के मानव अधिकार

नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों की अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा में सम्मिलित विभिन्न अधिकारों को प्रथम पीढ़ी के मानवाधिकार कहा जाता है. ये अधिकार परम्परागत हैं तथा लम्बे समय में ग्रीक नगर राज्य के समय से विकसित हुए हैं. ये अधिकार विभिन्न राज्यों के राष्ट्रीय संविधानों, सिविल एवं राजनैतिक प्रसंविदा पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा, मानव अधिकारों पर यूरोपीयन अभिसमयों तथा अफ्रीकी दस्तावेजों में सम्मिलित किये गये हैं. भारत के संविधान के ‘भाग तीन’ में भी नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों को सम्मिलित किया गया है.

2. द्वितीय पीढ़ी के मानव अधिकार

आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों की अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा में सम्मिलित विभिन्न अधिकारों को द्वितीय पीढ़ी का अधिकार कहा जाता है क्योंकि इनकी उत्पत्ति नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों के पश्चात हुई, इन अधिकारों का विकास नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों को प्रभावशाली बनाने के लिए हुआ क्योंकि नागरिक अधिकारों का स्वयं में कोई विशेष अर्थ नहीं है. जब तक कि व्यक्ति के पास सामाजिक एवं आर्थिक अधिकार न हों भारतीय संविधान के भाग चार में सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों को समाविष्ट किया गया है.

3. तृतीय पीढ़ी के मानव अधिकार

आत्मनिर्णय का अधिकार, विकास का अधिकार एवं शान्ति का अधिकार तृतीय कोटि से सम्बन्धित अधिकार हैं ये सभी अधिकार अभी अपने विकासकाल में ही हैं.

मानव अधिकारों का उद्भव एवं विकास

ऐतिहासिक रूप में मानवाधिकारों के प्रति संघर्ष का प्रमाण 15 जून, 1215 से मिलता है. उस समय ब्रिटेन के तत्कालीन राजा द्वारा मानव अधिकारों के सम्बन्ध में एक दस्तावेज जारी किया गया. जिसे मैग्नाकार्टा (Magna Carta) कहा जाता है. इसके बाद 1628 के अधिकार पायना पत्र तथा 1689 के अधिकार पत्र (Bill Of Rights) मानवाधिकारों से सम्बन्धित दस्तावेज जारी किये गये.

फ्रांस की क्रांति के बाद 1789 से संविधानों में मानव अधिकारों को शामिल किये जाने की प्रथा प्रारम्भ हुई. 1791 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने प्रथम 10 संशोधनों के द्वारा नागरिकों को मूलभूत अधिकार प्रदान किये.

मानव अधिकारों पद का प्रयोग सर्वप्रथम अमरीकन राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने 16 जनवरी, 1941 में कांग्रेस को संबोधित अपने प्रसिद्ध संदेश में किया था जिसमें उन्होंने चार भावपूर्ण या मर्मभूत स्वतंत्रताओं पर आधारित विश्व की घोषणा की थी इनको उन्होंने इस प्रकार सूचीबद्ध किया था –

  • वाक् स्वातंत्र्य
  • धर्म स्वातंत्र्य
  • गरीबी से मुक्ति और
  • भय से स्वातंत्र्य.

चार स्वातंत्र्य संदेश के अनुक्रम में राष्ट्रपति ने घोषणा किया स्वातंत्र्य से हर जगह मानव अधिकारों की सर्वोच्चता अभिप्रेत है. हमारा समर्थन उन्हीं को है; जो इन अधिकारों को पाने के लिए या बनाये रखने के लिये संघर्ष करते हैं. मानव अधिकारों’ पद का प्रयोग फिर अटलांटिक चार्टर में किया गया था. तदनुरूप मानव अधिकारों पद का लिखित प्रयोग संयुक्त राष्ट्र चार्टर में पाया जाता है. जिसको द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात सैनफ्रांसिस्कों में 25 जून, 1945 को अंगीकृत किया गया था. उसी वर्ष के अक्टूबर माह में बहुसख्या में हस्ताक्षरकर्ताओं ने इसका अनुसमर्थन कर दिया. संयुक्त राष्ट्र चार्टर की उद्देशिका में घोषणा की गयी कि अन्य बातों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य मूल मानव अधिकारों के प्रति निष्ठा को पुनः अभिपुष्ट करना होगा. तदुपरांत संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद में कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र के प्रयोजन मूलवंश, लिंग, भाषा या धर्म के आधार पर विभेद किये बिना मानव अधिकारों और मूल स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान की अभिवृद्धि करने और उसे प्रोत्साहित करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने होंगे.

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकार का विकास

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों के सम्बन्ध में सर्वप्रथम शान्ति स्थापना लीग नामक संस्था का गठन किया गया. इसी क्रम में 1920 में राष्ट्र संघ (League of Nations) का गठन किया गया है परन्तु ये प्रक्रियायें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निरर्थक साबित हुई.

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने 1941 में मानवाधिकारों के सम्बन्ध में जबरदस्त वकालत की तथा उन्होंने मानव की चार मूलभूत स्वतंत्रताओं का उल्लेख किया. 1945 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के गठन के प्रारूप की चर्चा में मानवाधिकारों पर भी व्यापक बहस हुई. 1946 में रूजवेल्ट की अध्यक्षता में प्रथम मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई. उसके द्वारा मानवाधिकार पर विश्वव्यापी घोषणा तैयार की गई, जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 दिसम्बर, 1948 को स्वीकार किया तथा बाद में 20 दिसम्बर को मानवाधिकार दिवस घोषित किया गया. इस प्रस्ताव को मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (Universal Declaration of Human Rights) का नाम दिया गया. इस सम्बन्ध में 1954 तक दो प्रसंविदायें तैयार की गई-

  1. नागरिक एवं राजनैतिक अधिकार प्रसंविदायें
  2. आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार प्रसंविदायें

इन प्रसंविदाओं को 3 जनवरी तथा 23 मार्च, 1976 से लागू किया गया. वर्तमान में मानवाधिकारों के सम्बन्ध में 43 सदस्यीय मानवाधिकार आयोग तथा 26 सदस्यीय उप-आयोग का गठन किया गया था जिसमें एक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (United Nations High Commissioner of Human Rights) के पद का सृजन किया गया.

मानवाधिकार के सम्बन्ध में अन्य महत्वपूर्ण अभिसमय

  • जनवध के अपराध को रोकने तथा दण्डित करने पर अभिसमय, 1951
  • सभी प्रकार के जातीय भेदभाव को समाप्त करने पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय, 1969
  • महिलाओं के विरुद्ध सभी भेदभाव को समाप्त करने पर अभिसमय, 1981
  • बालकों के अधिकारों पर अभिसमय, 1990
  • विस्थापित कर्नी तथा उनके परिवारों के सदस्यों के अधिकारों के संरक्षण पर अभिसमय
  • आतंकवाद के लिए वित्त प्रदान करने के दमन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय, 1999

मौलिक अधिकारों एवं मानव अधिकारों में अन्तर

भारतीय संविधान में मूल अधिकार की कोई परिभाषा नहीं दी गयी है. संविधानों की परम्परा प्रारम्भ होने के पूर्व इन अधिकारों को प्राकृतिक और अप्रतिदेव अधिकार कहा जाता था. जिसके माध्यम से शासकों के ऊपर अंकुश रखने का प्रयास किया गया था. इंग्लैण्ड में मूल अधिकार वे अधिकार कहे जाते हैं जो बिल आफ राइट्स द्वारा जनता ने प्राप्त किये हैं. अमेरिका और फ्रांस में इन अधिकारों को नैसर्गिक और अप्रतिदेय अधिकारों के रूप में स्वीकार किया गया है. भारत में गोलक नाथ के मामले में इन अधिकारों को नैसर्गिक और अप्रतिदेय अधिकार माना गया है.

भारतीय संविधान के भाग 3 में मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है. ये अधिकार राज्य के विरुद्ध व्यक्ति को संरक्षण प्रदान करते हैं.

मानवाधिकार की परिभाषा मानवाधिकारों को सार्वभौमिक घोषणा में नहीं की गयी है. मानवाधिकार वास्तव में वे अधिकार हैं जो प्रत्येक मनुष्य को केवल इस आधार पर मिलना चाहिए क्योंकि वह मनुष्य है मानवाधिकारों की सामान्यतया परिभाषा नहीं दी जा सकती है. यह वह अधिकार है जो हमारी प्रकृति में अन्तर्निहित है तथा अपने मानवीय गुणों के विकास तथा आध्यात्मिक एवं अन्य आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में सहायक होता है. मानवाधिकारों को मूल या नैसर्गिक अधिकार भी कहते हैं क्योंकि यह वह अधिकार है जिन्हें किसी विधायन या सरकार के किसी कृत्य द्वारा छीना नहीं जा सकता है. सभी मानवाधिकार मूल अधिकार नहीं हैं. लेकिन सभी मूल अधिकार मानवाधिकार हैं. मानवाधिकार उसे माना जाता है जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर में एवं मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा में वर्णित है.

मूल अधिकारों की भाँति मानव अधिकार भी कुछ युक्तियुक्त प्रतिबन्धों के अधीन होते हैं. मानवाधिकार के उल्लंधन पर अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अन्तर्गत कार्यवाही की जा सकती मूल अधिकार के उल्लंघन में बनाई गई विधि को उच्चतम न्यायालय असंवैधानिक घोषित कर सकता है.

मानवाधिकार मूल अधिकार से व्यापक है. जो अधिकार भारतीय संविधान के भाग 3 (अनुच्छेद 12 से 35) में वर्णित हैं उन्हें मूल अधिकार का दर्जा दिया गया है. जबकि मानवाधिकारों में इन अधिकारों के अतिरिक्त अन्य अधिकारों को शामिल किया गया है. भारतीय उच्चतम न्यायालय ने भी अनुच्छेद 21 का विस्तृत निर्वचन करते हुए अनेक मानवाधिकारों को मूल अधिकार का दर्जा प्रदान किया है. इस प्रकार मूल अधिकार संकीर्ण है लेकिन मानवाधिकार व्यापक है.

मानव अधिकार प्राकृतिक अधिकार है?

मानव अधिकार वे न्यूनतम अधिकार हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक रूप से मानव गरिमा को बनाये रखने के लिए आवश्यक है, उन्हें मानवाधिकार कहा जा सकता है. इस प्रकार मानव अधिकारों की धारणा आवश्यक रूप से न्यूनतम मानव आवश्यकताओं पर आधारित है.

यद्यपि मानव अधिकारों की संकल्पना उतनी ही पुरानी है जितनी कि प्राकृतिक विधि पर आधारित प्राकृतिक अधिकारों का प्राचीन सिद्धान्त तथापि मानव अधिकारों पद की उत्पत्ति द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात अन्तर्राष्ट्रीय चार्टरों और अभिसमयों से हुई. मानव अधिकारों को कभी-कभी मौलिक या मूल या नैसर्गिक अधिकार भी कहते हैं. क्योंकि ये वे अधिकार हैं जिन्हें किसी विधायिनी या सरकार के किसी कृत्य द्वारा छीना नहीं जा सकता है तथा बहुधा उनका वर्णन या उल्लेख संविधान में किया जाता है. नैसर्गिक अधिकारों के रूप में उन्हें ऐसे अधिकारों के रूप में देखा जाता है जो प्रकृति से ही पुरुषों एवं महिलाओं के हैं. उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्राकृतिक अधिकारों के आधार पर मानव अधिकारों का निर्माण हुआ है. अतः मानवाधिकार प्राकृतिक अधिकार है |

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