प्रतिपरीक्षा का आशय क्या है?

प्रतिपरीक्षा क्या है?

प्रतिपरीक्षा या प्रतिपृच्छा (जिरह) किसे कहते हैं? साक्ष्य अधिनियम की धारा 137 के अनुसार, प्रतिपरीक्षा साक्षी की मुख्य परीक्षा के बाद होती है. एक पक्षकार के साक्षी की दूसरे पक्षकार द्वारा ली जाने वाली परीक्षा प्रतिपरीक्षा या प्रतिपृच्छा (जिरह) कहलाती है. किसी गवाह का साक्ष्य तब तक वैध नहीं माना जाता है. जब तक कि विपक्षी को प्रतिपरीक्षा का अवसर न दिया गया हो। प्रतिपरीक्षा को सत्यता की जाँच का एक बहुत बड़ा अस्त्र माना जाता है.

विगमोर के अनुसार, प्रतिपरीक्षा सत्य को खोजने के लिए कभी आविष्कृत किया गया महानतम विधिक इन्जन है. यह सत्य तक पहुँचने की शल्य क्रिया है |

प्रतिपरीक्षा का उद्देश्य क्या है?

पावेल के अनुसार, प्रतिपरीक्षा का उद्देश्य गवाह की यथार्थता, विश्वसनीयता और उसकी योग्यता को सामने लाना होता है.

फिप्सन (Phipson) के अनुसार, प्रतिपरीक्षा के दो उद्देश्य होते हैं-

  1. खिलाफ पक्षकार के मामले को कमजोर या नष्ट करना.
  2. खिलाफ पक्ष के गवाह से अपने को सुदृढ़ करना.

प्रतिपरीक्षा का मूल उद्देश्य गवाह के साक्षिक मूल्य को कम करना या नष्ट करना होता है |

प्रतिपरीक्षा में कैसे प्रश्न पूछे जा सकते हैं?

प्रतिपरीक्षा में यह जरूरी नहीं है कि जो प्रश्न मुख्य परीक्षा में पूछे गये हैं और उनके जो उत्तर आये हैं उन्हीं के बारे में प्रश्नों को पूछा जाय प्रतिपरीक्षा में साक्षी की विश्वसनीयता को चोट पहुँचाने वाले प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं.

प्रतिपरीक्षा में साक्षी से निम्नलिखित प्रश्न पूछे जा सकते हैं-

  1. कोई भी सुसंगत तथ्य जो कि आवश्यक नहीं है कि वह मुख्य परीक्षा के कथनों में आया ही हो.
  2. शील का साक्ष्य देने वाले साक्षियों के सम्बन्ध में कोई भी प्रश्न.
  3. कोई भी सूचक प्रश्न.
  4. खण्डन करने के लिए उसके पूर्ववर्ती लिखित कथन के बारे में प्रश्न.
  5. उसकी सत्यवादिता परखने सम्बन्धी प्रश्न.
  6. लेखबद्ध विषयों सम्बन्धी कोई प्रश्न।
  7. उन तथ्यों के बारे में, जो उसकी विश्वसनीयता को धक्का पहुँचाते हों.
  8. जीवन में उसकी स्थिति क्या है, सम्बन्धी प्रश्न.
  9. उसके ज्ञान के स्रोतों सम्बन्धी प्रश्न.
  10. उसके आपराधिक जीवन सम्बन्धी प्रश्न |

कौन से प्रश्न नहीं पूछे जा सकते हैं?

भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 376, धारा 376 (क), धारा 376 (ख), धारा 376 (ग), धारा 376 (घ) या धारा 376 (ङ) के अधीन किसी अपराध के लिए या ऐसे किसी अपराध को करने के प्रयत्न के किसी अभियोजन में जहां सम्मति का प्रश्न विवाद्य है. वहां पीड़िता की प्रतिपरीक्षा में उसके साधारण अनैतिक आचरण या किसी व्यक्ति के साथ पूर्व लैंगिक अनुभव के बारे में ऐसी सम्मति या सम्मति की गुणवत्ता साबित करने के लिए साक्ष्य देना या प्रश्नों को पूछना अनुज्ञेय नहीं होगा.

अनुमति प्रश्नों को प्रतिपरीक्षा में नहीं पूछा जाना चाहिए साथ ही यदि किसी साक्षों के शील पर दोष लगाकर उसकी विश्वसनीयता पर आघात लगाने के लिये प्रश्न पूछे जाते हैं तो यह ध्यान रखना होगा कि वे अनुचित न हों। प्रश्नों की भाषा अश्लील या कलंकात्मक नहीं होनी चाहिए |

अपने ही द्वारा बुलाये गये साक्षी की प्रतिपरीक्षा?

जब किसी साक्षी को प्रतिकूल साक्षी घोषित कर दिया जाता है तो साक्ष्य अधिनियम की धारा 154 के तहत न्यायालय की आज्ञा से उसकी प्रतिपरीक्षा की जा सकती है और तब उससे वे सभी प्रश्न पूछे जा सकते हैं, जो विरोधी पक्षकार उससे प्रतिपरीक्षा में पूछ सकता था।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 154 (1) में यह कहा गया है कि न्यायालय उस व्यक्ति की, जो साक्षी को बुलाता है उस साक्षी से कोई ऐसे प्रश्न करने की अपने विवेकानुसार अनुज्ञा दे सकेगा जो प्रतिपक्षी द्वारा प्रतिपरीक्षा में किये जा सकते हैं.

उपधारा (2) के अनुसार, धारा 154 (1) के अधीन प्रतिपरीक्षा के लिए न्यायालय द्वारा अनुज्ञात व्यक्ति को ऐसे साक्षी के साक्ष्य के किसी भाग पर निर्भर रहने के हक से वंचित नहीं करती है. अर्थात साक्षी के साक्ष्य को बुलाने वाला पक्षकार, अपने हक में प्रयोग कर सकता है |

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