प्रतिसादन क्या है? | प्रतिसादन के प्रकार | वैध प्रतिसादन और साम्यिक प्रतिसादन में अन्तर

प्रतिसादन क्या है? | प्रतिसादन के प्रकार | वैध प्रतिसादन और साम्यिक प्रतिसादन में अन्तर

प्रतिसादन

प्रतिसादन (Set-off) अथवा मुजराई विधि का वह सिद्धान्त है जो प्रतिसादन को किन्हीं परिस्थितियों के अन्तर्गत न्यायालय के समक्ष वादी के विरुद्ध अपना दावा प्रस्तुत करने की अनुमति देता है. यह ऋणों की एक पारस्परिक विमुक्ति है और इस प्रकार से धन के लिए प्रतिदावा है जो वादी के दावे को समाप्त भी कर सकता है (आदेश 18 नियम 6) |

प्रतिसादन के प्रकार

प्रतिसादन दो प्रकार का होता है-

  1. वैध प्रतिसादन (Legal Set-off)
  2. साम्यिक प्रतिसादन (Equitable Set-off)

1. वैध प्रतिसादन

इस प्रकार के प्रतिसादन में धन के लिए वाद में प्रतिवादी द्वारा धन की माँग होती है. जिसके लिए वह उसी वाद कारण से उत्पन्न कार्यवाही वाद के विरुद्ध कर सकता है जिसका प्रभाव यह होगा कि वादी का वाद उस समय तक समाप्त हो जायेगा और वादी द्वारा प्रतिवादी को जो कुछ देय है, उसको कम करके अपने वाद की राशि प्राप्त कर सकता है.

वैध प्रतिसादन के उदाहरण

  1. ‘अ’, ‘ब’ के विरुद्ध 500 रुपये के विनिमय-पत्र (Bill Of Exchange) के आधार पर वाद संस्थित करता है. ‘ब’, ‘अ’ के विरुद्ध 100 रुपये का एक निर्णय धारण करता है. दोनों एक निश्चित आर्थिक माँग के कारण प्रतिसादन हो सकते हैं.
  2. ‘ब’ और ‘स’ के साझेदारी फर्म से ‘अ’ को 1000 रुपये देते हैं. ‘ब’, ‘स’ को जीवित छोड़ कर मर जाता है. ‘अ’, ‘स’ पर उसकी अलग हैसियत में 1500 रुपये के लिए वाद संस्थित करता है. ‘स’ 1000 रुपये के ऋण का प्रतिसादन कर सकता है.
  3. ‘अ’, ‘ब’ और ‘स’ के विरुद्ध 1000 रुपये के लिए वाद संस्थित करता है. ‘ब’ केवल ‘अ’ द्वारा उसको देय ऋण का प्रतिसादन नहीं कर सकता है |

वैध प्रतिसादन की आवश्यक शर्ते

1. धन की वसूली

वैध प्रतिसादन के लिए वाद का धन की वापसी के लिए होना जरूरी है जैसे; लेखा के लिए वाद.

2. अभिनिश्चित धनराशि

प्रतिवादी का दावा किसी निश्चित धनराशि के लिए होना चाहिए न कि किसी अभिनिर्धारित हानिपूर्ति के लिए.

3. वैधानिक रूप से वसूली योग्य धनराशि

प्रतिवादी के दावे की धनराशि वैध रूप से वापस प्राप्त किये जाने योग्य होनी चाहिये. इसे मियाद (Limitation) द्वारा वर्जित नहीं होना चाहिए.

4. प्रतिवादियों द्वारा वसूली जाने योग्य धनराशि

उपर्युक्त धनराशि प्रतिवादी के द्वारा या प्रतिवादियों के द्वारा वसूली जाने योग्य होनी चाहिए.

5. वही हैसियत

दोनों पक्षकारों का स्वरूप वही होना चाहिए जो कि उनकी वादी के वाद में है.

2. साम्यिक प्रतिसादन

साम्यिक प्रतिसादन से तात्पर्य किसी ऐसी धनराशि की मुजराई के लिए वादी के विरुद्ध दावे से है जो अनिश्चित होती है, कोई ऐसा दावा वैध मुजराई से भिन्न उसी संव्यवहार से सम्बन्धित होता है जिसके सम्बन्ध में या जिसके आधार पर वादी प्रतिवादी के विरुद्ध दावा दायर करता है. चूँकि प्रतिवादी का मुजराई का ऐसा दावा एक अनिश्चित धनराशि के लिये होता है, इसलिये न्यायालय को सबसे पहले उसकी जाँच करके उसे निश्चित करना होता है, जैसे किसी नुकसानी (हर्जाना-Demages) को मुजराई के लिये दावा एक साम्यिक मुजराई का दावा है.

यद्यपि साम्यिक प्रतिसादन का दावा साम्या की विधि के अन्तर्गत न्यायालय के स्वविवेक (Discretion) के अधीन होता है, फिर भी ‘वादों की बहुलता’ को रोकने की लोक-नीति के अन्तर्गत न्यायालय उसे मान्य करते हैं और न्यायिक रूप से उस पर विचार करते हैं और उसका भी परीक्षण करते हैं |

साम्यिक प्रतिसादन का भारतीय न्यायालयों द्वारा मान्य किया जाना

यद्यपि आदेश 8, नियम 6 केवल वैध प्रतिसादन को ही मान्यता देता है, फिर भी साम्यिक प्रतिसादन की मान्यता देने का उदाहरण स्वयं इसी संहिता का आदेश 20, नियम 19 (3) है, जो यह उपबन्धित करता है कि “चाहे मुजराई या प्रतिदावा आदेश के नियम 6 के अधीन या अन्यथा अनुज्ञेय हो, इस नियम के उपबन्ध लागू होंगे.”

इलाहाबाद बैंक लिमिटेड बनाम शंकर लाल, 1968 JLJ (SN) 41 के मामले में यह कहा गया है कि वर्तमान नियम नुकसानी जैसी किसी अनिश्चित रकम के सम्बन्ध में मुजराई की अनुमति नहीं देता है, किन्तु अब यह सुस्थापित है कि प्रतिवादी को ऐसी मुजराई के लिये अनुमति दी जा सकती है |

वैध प्रतिसादन और साम्यिक प्रतिसादन के बीच अन्तर

  1. वैध प्रतिसादन का दावा एक निश्चित धनराशि के लिये होता है, जबकि साम्यिक प्रतिसादन का दावा एक अनिश्चित धनराशि के लिए होता है.
  2. वैध प्रतिसादन के दावे के लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह उसी संव्यवहार से सम्बन्धित हो जिससे वादी का दावा सम्बन्धित होता है, जबकि साम्यिक प्रतिसादन के दावे के लिये यह आवश्यक है कि वह उसी संव्यवहार से सम्बन्धित हो जिससे वादी का दावा सम्बन्धित होता है.
  3. वैध प्रतिसादन की रकम विधिक रूप से वसूली-योग्य होती है, जैसे; वाद के दायर करने की तारीख पर उसे मियाद बाधित (time-barred) नहीं होना चाहिये, जबकि साम्यिक प्रतिसादन के दावे का विधिक रूप से वसूल-योग्य होना आवश्यक नहीं है, वह किसी मियाद बाधित रकम के लिये भी किया जा सकता है.
  4. वैध प्रतिसादन का दावा ग्रहण करने और उसका निपटारा करने के लिये न्यायालय विधिक रूप से बाध्य होता है, जबकि साम्यिक प्रतिसादन का दावा मान्य करना न्यायालय के स्वविवेक के अधीन होता है.
  5. वैध प्रतिसादन के दावे के लिये न्यायालय शुल्क देय होता है, जबकि साम्यिक प्रतिसादन के दावे के लिये न्यायालय शुल्क देय होता है |

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