जबरी छुट्टी का अर्थ, परिभाषा एवं प्रतिकर पाने का अधिकार?

जबरी छुट्टी का अर्थ, परिभाषा एवं प्रतिकर पाने का अधिकार?

जबरी छुट्टी का अर्थ

जबरी छुट्टी का अर्थ है-नियोजक (मालिक) को कोयला, शक्ति (Power) अथवा कच्चा माल की कमी अथवा माल के अभाव या मशीन की खराबी अथवा प्रकृति के प्रकोप अथवा कोई अन्य सम्बन्धित कारण से, कामगार जिसका नाम उसके औद्योगिक व्यवस्थापन की उपस्थिति नामावली में अंकित है और जिसकी छंटनी नहीं हुई है को रोजगार देने की असफलता, अस्वीकृति अथवा असमर्थता |

जबरी छुट्टी की परिभाषा

जबरी छुट्टी से तात्पर्य किसी श्रमिक को अस्थायी रूप से काम से अलग रखना या काम पर न लेना है. इस दौरान श्रमिक तथा मालिक के सम्बन्ध समाप्त नहीं होते बल्कि निलम्बित हो जाते हैं. यदि कोई श्रमिक जिसका कि उस औद्योगिक संस्था की उपस्थिति पंजिका (Master Roll) में नाम निर्दिष्ट है किसी निश्चित समय पर अपने आपको कार्य के लिए उपस्थित रहता है लेकिन नियोजक निर्धारित समय के 2 घण्टे के भीतर काम नहीं देता है तो श्रमिक की उस दिन की जबरी छुट्टी (Lay-off) मानी जायेगी |

निम्नलिखित परिस्थितियों में जबरी छुट्टी वैध होगी-

  1. कोयले या ईंधन के अभाव में मशीन का न चलना,
  2. विद्युत शक्ति का अभाव,
  3. कच्चे माल का अभाव या अनुपलब्धि,
  4. मशीन का खराब होना।
  5. जलभराव जिससे मशीन का संचालन सुचारु रूप से कठिन हो।
  6. अन्य प्राकृतिक आपदायें |

जबरी छुट्टी की दशा में प्रतिकर पाने का अधिकार

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा ’25ग’ के अधीन किसी कर्मकार को ऐसी अवधि के लिए नियोजक से प्रतिकर प्राप्त करने के लिए अधिकृत करती है जिस अवधि में उसे काम के बिना रखा गया है. जब नियोजक अपने कर्मकारों को ऐसे कारणवश काम से अलग रखता है जिस पर कि उसका नियंत्रण नहीं है तो उसका कर्तव्य होता है कि जितनी अवधि तक कर्मकारों को बिना कार्य के रखा गया है उस अवधि तक उन्हें प्रतिकर जो कि महंगाई भत्ते के 50 प्रतिशत के जोड़ के बराबर होगा.

  1. यदि कर्मकार को 12 महीने की किसी अवधि के दौरान 45 दिनों से अधिक जबरी छुट्टी दी गई है, तो प्रथम 45 दिनों के बाद की जबरी छुट्टी के लिये उस दशा में कोई प्रतिकर देय नहीं होगा जब इस सम्बन्ध में नियोजक और कर्मकार के बीच कोई करार किया जा चुका हो, और
  2. उक्त परन्तुक के अधीन किसी मामले में नियोजक, धारा ’25च’ के अधीन प्रथम 45 दिनों के बाद वैधपूर्ण रूप से छँटनी कर सकता है और ऐसा करने पर ऐसी छँटनी के लिये उस कर्मकार को जो प्रतिकर देय होगा, उसमें से उस प्रतिकर की मुजराई (Muzrai) की जायगी जो पूर्ववर्ती 12 महीनों के दौरान किसी जबरी छुट्टी की अवधि के लिये उसे पहले ही दिया जा चुका हो |

उपक्रमों के अन्तरण की दशा में प्रतिकर पाने का अधिकार

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा ’25चच’ के अनुसार, जहाँ कोई उपक्रम एक नियोजक से दूसरे नियोजक को अन्तरित कर दिया गया हो, वहाँ ऐसे अन्तरण से ठीक पूर्व उस उपक्रम में एक वर्ष की लगातार सेवा में रहने वाला प्रत्येक कर्मकार, धारा ’25च’ के अधीन नोटिस और प्रतिकर पाने का हकदार होगा मानो कि उसकी छँटनी कर दी गई थी |

उपक्रमों को बन्द करने की दशा में प्रतिकर पाने का अधिकार

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा ’25चचच’ के अनुसार, जहाँ कोई उपक्रम चाहे जिस कारण से भी हो बन्द कर दिया गया है वहाँ एक वर्ष तक की लगातार सेवा में रहने वाला प्रत्येक कर्मकार धारा ’25च’ के अन्तर्गत नोटिस और प्रतिकर पाने का हकदार होगा मानो कि उसकी छँटनी कर दी गई हो. किन्तु यह प्रतिकर उस दिशा में जब कि नियोजक की शक्ति के बाहर अपरिहार्य कारणों से उपक्रम बन्द कर दिया गया हो, उस कर्मकार के 3 मास के औसत वेतन से अधिक नहीं होगा |

वे परिस्थितियाँ जिनमें उस कर्मकार को जिसकी जबरी छुट्टी की गई है कोई प्रतिकर देय नहीं होता है.

निम्नलिखित परिस्थितियों में कोई प्रतिकर देय नहीं होगा-

  1. यदि वह व्यवस्थापन में जिस काम पर नियुक्त है उसी व्यवस्थापन में दूसरा वैकल्पिक काम दिये जाने पर उसे अस्वीकार कर देता है अथवा किसी अन्य व्यवस्थापन में जो उसी मालिक से सम्बन्धित है ऐसा कार्य करना अस्वीकार करता है.
  2. यदि वह संस्थापन के स्थान पर नियत समय पर काम के निर्धारित घन्टों में कम से कम एक दिन में एक बार काम करने के लिए अपने आप को उपस्थित नहीं करता. अथवा
  3. यदि ऐसी जबरी छुट्टी हड़ताल के कारण है या व्यवस्थापन के दूसरे भाग में कामगार द्वारा कम उत्पादन करने के कारण है.
  4. यदि ऐसी जबरी छुट्टी के लिए विहित प्राधिकारी की पूर्व अनुमति, या उसे जारी रखने की उस प्राधिकारी को अनुमति प्राप्त कर ली गई है |

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