समन मामला और वारंट मामला के बीच अंतर?

समन और वारंट के बीच अंतर?

  1. समन मामला और वारंट मामला क्या है? समन मामलों में दो वर्ष से अनधिक (कम) कारावास का दण्ड दिया जा सकता है, जबकि वारन्ट मामलों में मृत्यु-दण्ड, आजीवन कारावास एवं दो वर्ष से अधिक अवधि तक के कारावास का दण्ड दिया जा सकता है.
  2. समन मामलों में अभियुक्त को दोषसिद्ध या दोषमुक्त किए जाने के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया को अंगीकृत किया जा सकता है, जबकि वारन्ट मामलों में संक्षिप्त प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया जाता। किसी अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है या नहीं, इस बात का अवधारण करने के लिए साक्षियों को बुलाया जाना आवश्यक होता है.
  3. समन मामले का विचारण अभियुक्त को सारांश-अभियोग सुनाने एवं उसके कथन लेखबद्ध किये जाने से प्रारम्भ होता है, जबकि वारन्ट मामले का प्रारम्भ अभियोजक के साक्ष्य से होता है एवं इसके पश्चात् अभियुक्त के कथनों को लेखबद्ध किया जाता है.
  4. समन मामलों में औपचारिक आरोप विरचित किये जाने की आवश्यकता नहीं होती, जबकि वारन्ट मामले में औपचारिक आरोप का विरचित किया जाना आवश्यक है.
  5. समन मामलों में अभियुक्त को अभियोजन पक्ष के साक्षियों की प्रतिपरीक्षा करने का एक ही अवसर मिलता है, जबकि वारन्ट मामलों में अभियोजन पक्ष के साक्षियों से प्रतिपरीक्षा के दो अवसर मिलते हैं- एक आरोप से पूर्व एवं दूसरा आरोप के बाद.
  6. समन मामलों में परिवादी न्यायालय की अनुमति से परिवाद को वापस ले सकता और ऐसी अवस्था में अभियुक्त को दोषमुक्त घोषित कर दिया जाता है, जबकि वारन्ट मामलों में सामान्यतया परिवाद को वापस लेने की अनुमति नहीं दी जाती किन्हीं विशेष मामलों में जो राज्य से सम्बन्धित हों, वापसी केवल विधि परामर्श दाता द्वारा ही हो सकती है.
  7. समन मामलों में अभियुक्त को दोषसिद्ध या दोषमुक्त ही किया जा सकता है, जबकि वारन्ट मामलों में अभियुक्त को दोषसिद्धि या दोषमुक्ति के अलावा उन्मोचन का एक और आदेश दिया जा सकता है.
  8. समन मामला एक बार समाप्त हो जाने पर पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता, जबकि वारन्ट मामले में अभियुक्त को दोषसिद्धि या दोषमुक्ति के अलावा उन्मोचन का एक और आदेश दिया जा सकता है.
  9. समन मामलों में अभियुक्त को ऐसे किसी अपराध के लिए परीक्षित किया जा सकता है जिसका कि परिवाद में उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन जो सिद्ध किये गये या स्वीकार किये गये तथ्यों से स्थापित हो जाता है, जबकि लेकिन वारण्ट मामलों में ऐसी अवस्था में एक पृथक आरोप विरचित किया जाता है. एवं उसके बारे में अभियुक्त को कथन करने के लिए पूछा जाता है |

समन मामलों को वारण्ट मामलों में सम्परिवर्तित करने की न्यायालय की शक्ति?

CrPC की धारा 259 मजिस्ट्रेट को समन मामलों को वारण्ट मामलों में सम्परिवर्तित करने की शक्ति प्रदान करती है. इस धारा के अनुसार मजिस्ट्रेट किसी अपराध से सम्बन्धित समन मामले के विचारण के दौरान समन मामले को वारण्ट मामले में सम्परिवर्तित कर सकता है, यदि निम्न शर्ते पूरी हों-

  1. अपराध 6 मास से अधिक अवधि के कारावास से दण्डनीय हो।
  2. मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता हो कि न्याय के हित में उस अपराध का विचारण वारण्ट मामलों के विचारण की प्रक्रिया के अनुसार किया जाना चाहिए।

यदि उपरोक्त शर्तें पूरी हो जाती हैं तो मजिस्ट्रेट वारण्ट मामलों के विचारण के लिए इस संहिता द्वारा उपबन्धित रीति से उस मामले की पुनः सुनवाई कर सकता है और ऐसे साक्षियों को पुनः बुला सकता है जिनकी परीक्षा की जा चुकी हैं |

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