पूर्व-निर्णय | पूर्व-निर्णय का सिद्धांत

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पूर्व-निर्णय | पूर्व-निर्णय का सिद्धांत

न्यायिक पूर्व-निर्णय का महत्व लगभग सभी विधि प्रणालियों में विद्यमान है. निर्णय देने वाले न्यायालय के ऊपर पूर्व-निर्णय की बाध्यता का तत्व निर्णीतानुसरण के रूप में उत्पन्न होता है यह विधि का साक्ष्य नहीं है बल्कि स्रोत है.

पूर्व-निर्णय का अर्थ

सामण्ड के अनुसार, न्यायिक पूर्व-निर्णय न्यायालय द्वारा दिया गया ऐसा निर्णय है जिसमें विधि का कोई सिद्धान्त निहित होता है. पूर्व-निर्णय में निहित सिद्धान्त जो उसे प्राधिकारिक तत्व प्रदान करता है विधिशास्त्र में इसे विनिश्चय का आधार कहते हैं. अर्थात पूर्व-निर्णय न्यायालय द्वारा निर्धारित ऐसे सिद्धान्त हैं जो भविष्य में न्यायालय के समक्ष निर्णय हेतु आने वाले समान वादों में लागू किये जाते हैं. यहां उल्लेखनीय है कि सभी पूर्व-निर्णय का रूप धारण नहीं करते बल्कि केवल ऐसे निर्णय हो पूर्वोक्ति का महत्व रखते हैं जो किसी नये नियम या सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हों.

कीटन के अनुसार, न्यायिक पूर्व-निर्णय न्यायालय द्वारा दिये गये ऐसे न्यायिक विनिश्चय हैं जिनके साथ कुछ प्राधिकार जोड़ दिये जाते हैं.

संक्षेप में पूर्व-निर्णय एक ऐसा आदेश है जो भावी आचरण का आधार हो सकती है, यह एक उपाय है जिसका निरन्तर उपयोग किया जाता है.

Prof. जॅक्स के अनुसार, न्यायिक पूर्व-निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा विवादित मामले पर दिया गया निर्णय है.

ग्रे के अनुसार, एक पूर्व-निर्णय के अन्तर्गत कही गयी प्रत्येक बात सम्मिलित है जो पश्चात्वर्ती आचरण के लिये नियम प्रस्तुत करती है.

निर्णीतानुसरण या निर्णयानुसरण का सिद्धान्त

यह सिद्धान्त अंग्रेजी विधि का मान्य सिद्धान्त है. इसके अनुसार पूर्व-निर्णय प्राधिकार पूर्ण तथा बन्धनकारी होते हैं. इनका अनुसरण किया जाना अनिवार्य है. जब अनेक निर्णयों द्वारा किसी वैधानिक प्रश्न को स्पष्टतः सुनिश्चित कर दिया जाता है तो उसका अनुसरण करने तथा उसे न बदलने के सिद्धान्त को निर्णयानुसरण का सिद्धान्त कहते हैं.

इसके लिए दो बातों का होना आवश्यक होता है-

  1. निर्णीत वादों के प्रकाशन (Law reporting) की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए.
  2. श्रेणीबद्ध न्यायालयों की निश्चित श्रृंखला (Hierarchy of courts) होनी चाहिए.

1949 में एबालिशन ऑफ प्रिवी काउन्सिल जुरिसडिक्शन ऐक्ट पारित करके भारत के न्यायालयों से प्रिवी काउन्सिल की अधिकारिता को समाप्त कर दिया गया तथा 1950 के बाद उच्चतम न्यायालय शीर्षस्थ अपीलीय न्यायालय बन गया.

भारत में निर्णयानुसरण का सिद्धान्त

भारत में इस निर्णय को पूर्ण रूप से मान्यता प्राप्त है. इस सिद्धान्त के दोनों आवश्यक तत्वों को यहाँ पूर्ण रूप से अपनाया गया है. प्रथम तो भारत में लॉ रिपोर्टिंग की समुचित व्यवस्था है तथा द्वितीय भारत में न्याय व्यवस्था में न्यायालयों की एक क्रमबद्ध श्रृंखला है जिसमें उच्चतम न्यायालय का सर्वोच्च स्थान है तथा इसके बाद उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय आते हैं.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार “भारत में उच्चतम न्यायालय का निर्णय भारत के सभी न्यायालयों पर बन्धनकारी होता है.” उच्च न्यायालय के निर्णय उसके अधीनस्थ न्यायालयों के प्रति बन्धनकारी हैं. परन्तु एक उच्च न्यायालय का निर्णय दूसरा उच्च न्यायालय मानने के लिए बाध्य नहीं है.

बंगाल इम्यूनिटी कंपनी लिमिटेड बनाम बिहार राज्य (AIR 1955) के मामले में अभिनिर्धारित किया गया कि भारत का उच्चतम न्यायालय स्वयं के निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं है. वह प्रिवी काउंसिल के निर्णयों को मानने के लिए भी बाध्य नहीं है.

A.R. अन्तुले बनाम R.S. नाइक (AIR 1988) के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अवलोकन किया है कि आवश्यक होने पर उच्चतम न्यायालय अपने पूर्व-निर्णय को पलट सकता है.

श्रवण सिंह लांबा बनाम भारत संघ (AIR 1995) के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अवधारित किया है कि उसके द्वारा दिये गये निर्णय की इठरोक्ति भी सभी अधीनस्थ न्यायालयों के लिए बन्धनकारी प्रभाव रखते हैं और वे उनका अनुसरण करने के लिए बाध्य हैं.

पूर्व-निर्णय के बन्धनकारी प्रभाव को नष्ट करने वाली स्थितियाँ

1. कानून की अनभिज्ञता

यदि कोई निर्णय, अधिनियम की अनभिज्ञता या जानकारी के होते हुए ही असावधानीवश दिया गया है तो वह बन्धनकारी नहीं होगा.

2. उच्चतम न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णयों के बीच विसंगति

यदि किसी न्यायालय द्वारा कोई ऐसा निर्णय दिया जाता है जो उच्चतर न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णय की अनदेखी करता है तो बन्धनकारी प्रभाव नहीं रखेगा.

3. उसी न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णयों के बीच विसंगति

कोई न्यायालय अपने पूर्ववर्ती ऐसे निर्णयों से आबद्ध नहीं है जो परस्पर प्रतिकूल हो.

4. समानतः विभक्त न्यायपीठों के निर्णय

यदि किसी न्यायालय में एक जैसी खण्डपीठ द्वारा निर्णय दिया जाता है तो वे निर्णय एक दूसरे पर बन्धनकारी नहीं होंगे. साथ ही यदि किसी खण्डपीठ में न्यायाधीशों का समान मत नहीं है तो उस खण्डपीठ द्वारा निर्णय नहीं दिया जाता है यदि दिया जाता है तो बन्धनकारी नहीं होगा.

5. वाद से सम्बन्धित किसी सुसंगत मुद्दे या निर्णय पर बहस पूरी किये बिना दिये गये निर्णय

यदि किसी विनिश्चय में अन्तर्ग्रस्त विधि-सम्बन्धी किसी महत्वपूर्ण मुद्दे की न्यायालय को जानकारी न रही हो, अथवा मुद्दा विचारार्थ प्रस्तुत न किया गया हो, तो ऐसा विनिश्चय अज्ञानतावश दिया गया कहा जाता है.5

6. निराकृत किये जाने योग्य विनिश्चंय

यदि न्यायालय द्वारा किसी मामले में निर्णय दिये जाने के बाद ऐसे नियम या अधिनियम को अधिनियमित किया जाता है जो उस निर्णय के विपरीत हो या विसंगत हो या उसे उच्चतर न्यायालय द्वारा पलट दिया गया हो या अस्वीकार कर दिया गया हो तो वह बन्धनकारी नहीं होगा.

7. भिन्न आधार पर विनिश्चय की पुष्टि

जब कभी अपीलीय न्यायालय द्वारा निचले न्यायालय के निर्णय की पुष्टि, विनिश्चय के आधार से भिन्न आधार पर की जाती है तो वह विनिश्चय बन्धनकारी नहीं होता है.

8. भ्रमात्मक निर्णय

विधि के गलत सिद्धान्तों पर आधारित निर्णय बन्धनकारी नहीं होते हैं.

9. भ्रामक रिपोर्टिंग

जब तक रिपोर्टिंग सही नहीं हो पूर्व-निर्णय, निर्णय नहीं होती हैं.

10. बार-बार चुनौती

बार-बार किसी पूर्व-निर्णय को चुनौती दिये जाने से निश्चितता नहीं रह जाती है |

पूर्व-निर्णय तथा विधान के बीच अंतर

  1. पूर्व-निर्णय में न्यायालय द्वारा दिया गया ऐसा निर्णय होता है जिसमें विधि का सिद्धान्त अन्तर्निहित होता है, जबकि विधान का तात्पर्य विधि के निर्माण से है.
  2. पूर्व-निर्णय में न्यायाधीशों के निर्णय के फलस्वरूप आता है, जबकि विधान विधायिका द्वारा निर्मित होते हैं.
  3. पूर्व-निर्णय में विधि के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया जाता है, जबकि विधान प्रत्यक्ष रूप से घोषित विधि है.
  4. पूर्व-निर्णय द्वारा प्रचलित विधि को समाप्त नहीं किया जा सकता है, जबकि विधान द्वारा किसी भी विधि को रद्द किया जा सकता है.
  5. पूर्व-निर्णय में सृजन निगमनात्मक पद्धति (Inductive Method) से होता है, जबकि विधान का निर्माण आगमनात्मक पद्धति (Deductive Method) से होता है |

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