न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के उद्देश्य

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के उद्देश्य क्या हैं?

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के उद्देश्य

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 का उद्देश्य कुछ सेवाओं में न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना है जहां शोषित, श्रमिकों की बहुतायत है अथवा जहां मजदूरों का शोषण किया जाता है.

भारत के उच्चतम न्यायालय ने अवलोकन किया है कि अधिनियम का जो भी उद्देश्य है वह न्यूनतम वेतन का सांविधिक निर्धारण है जो श्रमिकों के शोषण के अवसरों को रोकने के उद्देश्य से किया जाता है.

एडवर्ड मिल्स कंपनी लिमिटेड बनाम स्टेट आफ अजमेर (1954) अधिनियम का उद्देश्य निम्नांकित है-

  1. उद्योग में रक्त शोषण का अपवर्जन करना, अर्थात यह देखना कि भुगतान इतना कम न हो जिससे मजदूरी हानि में पड़ जाय.
  2. मजदूरी किये गये कार्य की मात्रा के समान होनी चाहिये और शोषण नहीं होना चाहिये.
  3. यह देखना कि असंगठित श्रमिक अनुचित सौदे के कारण पीड़ित न हो और उनके अधिकार रक्षित हों.
  4. यह देखना है कि श्रमिक को उचित भुगतान करके हड़ताल तथा तालाबन्दी जड़ से उखाड़ दी गयी है.

यह अधिनियम उन सेवाओं के लिए लागू होता है जो अनुसूची के प्रथम भाग में निर्धारित है. जैसे कि ऊनी कालीन, अथवा शाल व्यवस्थापन, चावल, आटा, दाल, मिर्च, तम्बाकू या बीड़ी का कारखाना, रबड़, चाय या काफी की कृषि सम्पदा, तेल मिल स्टेयर ब्रोकिंग, अभ्रक का कार्य, ताल निर्माण कार्य, चमड़ा बनाने का कारखाना तथा चमड़े से वस्तु निर्माण का कारखाना, पब्लिक मोटर ट्रांसपोर्ट तथा स्थानीय प्राधिकारी के विषय.

अधिनियम समय-समय पर मजदूरी के संशोधित किये जाने की व्यवस्था करता है और इसके द्वारा परामर्शदात्री समिति तथा परामर्शदाता मण्डल के लिये व्यवस्था की गयी है जो नियोजकों तथा कामगार दोनों का प्रतिनिधित्व करता है. जिसकी सम्मति मजदूरी का संशोधन करते समय ली जायगी. किन्तु जैसा कहा गया है यह तर्क स्वीकार करना असम्भव है कि निम्नतम मजदूरी निर्वाह-मजदूरी समय मान के अनुसार होनी चाहिए.

निर्वाह मजदूरी केवल उच्च रूप में औद्योगिक देशों में स्तर रूप में मानी जायेगी अथवा इन देशों में जो आर्थिक दृष्टि से बहुत आगे हैं. भारत में जहां राष्ट्रीयता का स्तर बहुत नीचा है और देश की सामान्य दयनीय आर्थिक स्थिति में असंगठित श्रमिक की स्थिरता के लिए उलझी हुई चेतावनी का उल्लेख करना उचित नहीं है वहां निर्वाह मजदूरी का आदर्श प्रगतिशील स्थिति में प्राप्त करना होगा. एक समुचित मजदूरी, जिसका आधार निम्नतम मजदूरी है, मजदूरी संरचना का निर्माण करेगी |

संवैधानिकता

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम संविधान के प्रावधानों के प्रतिकूल नहीं है. इससे व्यापार, पेशा, वृत्ति आदि के अंगीकार करने की स्वतंत्रता से सम्बन्धित मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं होता.

बाई A. ममेड बनाम न्यूनतम मजदूरी प्राधिकारी, (AIR 1972 SC 1721) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यक्त किया है कि इस अधिनियम का उद्देश्य अज्ञानी लोगों के शोषण के विरोध में है |

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