राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां और उद्घोषणा का प्रभाव?

राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों पर निबन्ध? | राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों का वर्णन?

राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां कितनी है?

राष्ट्रपति की आपातकालीन जारी करने की शक्ति

राष्ट्रपति इस संविधान के अन्तर्गत निम्नलिखित तीन दशाओं में आपात की उद्घोषणा जारी कर सकता है-

  1. युद्ध या वाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह होने की दशा में,
  2. किसी राज्य में संवैधानिक तन्त्र के विफल होने की दशा में,
  3. वित्तीय संकट उत्पन्न होने की दशा में।

1. युद्ध था बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह होने की दशा में आपात की उद्घोषणा


अनुच्छेद 352 अनुसार-

  1. यदि राष्ट्रपति इस बात से सन्तुष्ट है कि ऐसी गम्भीर आपात स्थिति मौजूद है जिसके द्वारा भारत या उसके राज्य क्षेत्र के किसी भाग की सुरक्षा, युद्ध या बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण संकट में है वह सम्पूर्ण भारत या उसके ऐसे किसी राज्य क्षेत्र के भाग के संबंध में, जैसा कि उद्घोषणा में निर्दिष्ट किया जाय, इस आशय के आपात की उद्घोषणा जारी कर सकेगा। ऐसी उद्घोषणा ऐसे युद्ध या बाया राजस्व के वास्तविक रूप से घटित होने के पहले ही जारी की जा सकेगी यदि राष्ट्रपति को इस बात का समाधान हो जाता है कि उपर्युक्त संकट सनिकट है.
  2. उपर्युक्त उद्घोषणा को किसी बाद की उद्घोषणा द्वारा परिवर्तित या रद्द किया जा सकेगा.
  3. राष्ट्रपति उपर्युक्त उद्घोषणा तभी जारी करेगा, जब पूरा केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल इस बात का निर्णय करे कि ऐसी उद्घोषणा जारी की जा सकती है और इस निर्णय को उसे लिखित में सूचित कर दिया गया है.
  4. इस अनुच्छेद के अन्तर्गत जारी की गई प्रत्येक उद्घोषणा को संसद के प्रत्येक सदन के सामने रखा और जब तक कि वह किसी पहले की उदघोषणा को रद्द करने वाली उद्घोषणा न हो वह एक माह बीतने पर प्रभावती हो जायगी, जब तक कि इस अवधि के समान होने के पहले संसद के दोनों सदनों के संकल्प द्वारा उसे अनुमोदित नहीं कर दिया गया है.
  5. संसद द्वारा अनुमोदित होने पर उपर्युक्त उद्घोषणा जब तक उसे रद्द नहीं किया जाता है. अनुमोदन की तिथि से 6 माह तक लागू रहेगी, और पुनः संसद द्वारा अनुमोदित होने पर प्रत्येक बार 6 माह तक लागू रहेगी.

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यदि लोकसभा के विघटित हो जाने पर उपर्युक्त कोई उद्घोषणा की गई है, या उसके जारी किये जाने के एक माह के अन्दर, लोकसभा विघटन से जाती है, और राज्यसभा उसका अनुमोदन कर देती है. किन्तु लोकसभा ने इस अवधि के अन्दर उसका अनुमोदन नहीं किया है, तो दूसरी पुनर्गठित लोकसभा को पहली बैठक से एक माह बीतने पर वह उद्घोषणा प्रभावहीन हो जायगी यदि इस अवधि के अन्दर का अनुमोदन नहीं कर देती है.

इसी प्रकार, यदि किसी 6 माह की अवधि के दौरान जिस अवधि तक संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित होने पर ऐसी उद्घोषणा लागू रह सकती है, लोकसभा विघटत हो जाती है और इस अवधि के अन्दर उसके आगे जारी रहने का अनुमोदन राज्यसभा ने कर दिया हो, किन्तु लोकसभा ने न किया हो, तो, यदि दूसरी पुनर्गठित लोकसभा अपनी पहली बैठक के एक माह के अन्दर उसका अनुमोदन नहीं कर देती है, एक माह बीतने पर वह उद्घोषणा प्रभावहीन से जायगी.

  • (6) खण्डों (4) और (5) के प्रयोजनों के लिये, दोनों सदनों द्वारा कोई सकल्प, उसके सम्पूर्ण सदस्यों के बहुमत से और उस समय मौजूद तथा मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से ही पारित किया जाना चाहिये.
  • (7) यदि लोकसभा किसी उद्घोषणा को या उसके जारी रहने को अस्वीकृत कर देती है, तो राष्ट्रपति उस उद्घोषणा को रद्द कर देगा.
  • (8) यदि लोकसभा के कुल सदस्यों के दशांश (1/10) सदस्यों के लिखित में ऐसी उद्घोषणा की, या के जारी रहने को अस्वीकृत करने का संकल्प पेश करने के अपने आशय की सूचना या तो लोक सभाध्यक्ष को यदि सदन सत्र में है, या राष्ट्रपति को, जब सदन सम में न हो, दे दी है तो लोक सभाध्यक्ष या राष्ट्रपति यथास्थिति के द्वारा सूचना पाने के 14 दिन के अन्दर, सदन की विशेष बैठक ऐसे संकल्प पर विचार करने के लिये बुलायी जायगी.
  • (9) राष्ट्रपति युद्ध या बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के, या उनके सत्रिकट खतरों के विभिन्न आधारों पर विभिन्न उद्घोषणायें जारी कर सकेगा, चाहे खण्ड (1) के अन्तर्गत, जारी की गई ऐसी कोई एक उद्घोषणा पहले से ही लागू हो या नहीं.

[अनुच्छेद 352 के उर्युक्त उपबन्ध संविधान (44वाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 द्वारा संशोधित किये गये के अनुसार है।] इस संशोधन अधिनियम को जनता पार्टी द्वारा अपने अल्पकालिक शासन के दौरान इस दृष्टि से पारित किया गया था कि भविष्य में कोई भी सरकार इस अनुच्छेद के प्रावधानों का दुरुपयोग उस प्रकार से न कर सके जिस प्रकार से श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 1975 में किया था और उस समय जारी की गई आपातकाल की उद्घोषणा के अन्तर्गत् यद्यपि 1971 में जारी की गई एक आपात् उद्घोषणा पहले से ही लागू थी, देश भर में लाखों लोगों को बिना कारण जेल में 19 माह तक बन्द रखा गया था, और देश भर में मार्शल ला की तरह का एक अजीब सा भय और आतंक और सन्नाटा छा गया था.

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संविधान (59वाँ संशोधन) अधिनियम, 1988 द्वारा अनुच्छेद 352 में पुनः आन्तरिक अशान्ति के आधार पर आपातस्थिति लागू करने का उपबन्ध किया गया है. आन्तरिक अशान्ति के कारण भारत की अखण्डता को खतरा उत्पन्न होने की दशा में आपातस्थिति की घोषणा की जा सकती है.

आपातकाल की उद्घोषणा के प्रभाव

आपातकाल की उद्घोषणा के लागू रहने के दौरान, अनुच्छेद 353 के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रभाव होंगे-

  1. राज्यों को निर्देश देने तक संघ की कार्यपालिक की शक्ति का विस्तार होगा।
  2. संसद को ऐसे किसी विषय पर, जो संघ-सूची में न हो, कानून बनाने की और उसके द्वारा उस विषय के सम्बन्ध में संघ को या उसके पदाधिकारियों और प्राधिकारियों को शक्तियाँ और कर्तव्य सौंपने की शक्ति होगी।
    किन्तु यदि आपातकाल की उद्घोषणा भारतीय राज्य क्षेत्र के केवल किसी एक भाग तक ही लागू है, तो राज्यों को निर्देशदेने के संघ की उपर्युक्त कार्यपालिका शक्ति और संसद की कानून बनाने की उपर्युक्त शक्ति का विस्तार ऐसे किसी भी राज्य तक होगा जहाँ ऐसी उद्घोषणा लागू नहीं है, यदि और जहाँ तक, भारतीय राज्य क्षेत्र के उस भाग में की गतिविधियों के द्वारा, जहाँ आपातकाल की उद्घोषणा लागू है, भारत की या उसके राज्य क्षेत्र के किसी भाग की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है.
  3. राष्ट्रपति, अनुच्छेद 354 के अन्तर्गत, आदेश द्वारा या निदेश दे सकेगा कि अनुच्छेद 268 से लेकर अनुच्छेद 279 तक के उपबन्ध (जो संग और राज्यों के वित्तीय सम्बन्धों से सम्बन्धित हैं), ऐसे अपवादों और परिवर्तनों के साथ लागू होंगे, जैसा कि वह उचित समझे ऐसे किसी आदेश को यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के सामने रखा जायगा.
  4. संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह बाह्य आक्रमण और आन्तरिक अशान्ति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे और यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार इस संविधान के उपबन्धों के अनुसार ही चलाई जाती है.
  5. अनुच्छेद 19 के प्रावधान आपातकाल की उद्घोषणा के लागू रहते निलम्बित रहेंगे और राज्य कानून बनाकर उस अनुच्छेद द्वारा प्रदत किन्हीं भी स्वतन्त्रताओं का उल्लंघन कर सकेगा। ये स्वतन्त्रतायें ऐसी उद्घोषणा के समाप्त होने पर पुनजीवित हो जायेंगी, किन्तु आपातकाल के दौरान राज्य द्वारा किये गये किन्हीं भी कृत्यों के विरुद्ध आपातकाल के समाप्त हो जाने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की जा सकेगी.
  6. राष्ट्रपति, अनु 359 के अन्तर्गत, आपातकाल की उद्घोषणा के लागू रहने के दौरान, अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर, भाग 3 द्वारा प्रदत्त किन्हीं भी मौतिक अधिकारों के प्रवर्तन के अधिकार को आदेश द्वारा निलम्बित कर सकेगा. ऐसे प्रत्येक आदेश को यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के सामने रखा जायगा.
  7. संसद कानून बनाकर आपातकाल की उद्घोषणा के लागू रहने के दौरान, लोकसभा की अवधि को एक बार में एक वर्ष तक के लिये और बढ़ा सकेगी, जो अवधि किसी भी दशा में आपातकाल की उद्घोषणा के समाप्त होने के 6 माह बाद से अधिक नहीं होगी.
  8. अनुच्छेद 359 के अन्तर्गत भाखन सिंह बनाम पंजाब राज्य के बाद में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि राष्ट्रपति के आदेश के बावजूद निवारक निरोध में बन्द व्यक्ति इस आधार पर चुनौती दे सकता है कि उसका निरोध अधिनियम के विरुद्ध किया गया.

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    2. किसी राज्य में संवैधानिक तन्त्र के विफल होने की दशा में आपातकाल की उद्घोषणा

    अनुच्छेद 356 (1) के अन्तर्गत, यदि किसी राज्य के राज्यपाल से रिपोर्ट मिलने पर या अन्यथा, राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है, कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि उस राज्य का शासन इस संविधान के उपबन्धों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है, तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा-

    • (क) उस राज्य सरकार के सब या कोई कृत्य तथा राज्यपाल या राज्य विधान मण्डल को छोड़कार, राज्य के किसी निकाय या प्राधिकारी में निहित या उसके द्वारा प्रयोग की जाने वाली सब या कोई शक्ति अपने हाथ में ले सकेगा।
    • (ख) यह घोषित कर सकेगा कि राज्य विधान मण्डल की शक्तियाँ संसद के प्राधिकार के द्वारा या उसके अधीन प्रयोग की जाने योग्य होगी।
    • (ग) ऐसे अन्य प्रासंगिक और आनुषंगिक उपबन्ध कर सकेगा, जो उसकी उद्घोषणा के उद्देश्य को प्रभावशाली बनाने के लिये उसे आवश्यक या वांछनीय प्रतीत हो। किन्तु वह ऐसी उद्घोषणा द्वारा उच्च न्यायालयों से सम्बन्धित किसी उपबन्ध के प्रवर्तन को पूर्णतः या अंशतः निलम्बित नहीं कर सकेगा।
    • (2) ऐसी किसी उद्घोषणा को बाद की किसी उद्घोषणा द्वारा रद्द या परिवर्तित किया जा सकेगा।
    • (3) प्रत्येक ऐसी उद्घोषणा को संसद के प्रत्येक सदन के सामने रखा जायगा। यदि वह किसी पहले की उद्घोषणा को रद्द करने वाली उद्घोषणा नहीं है तो वह दो माह की अवधि बीतने के बाद प्रभावहीन हो जायगी, यदि इसके पहले ही संसद के दोनों सदनों के संकल्प द्वारा उसे अनुमोदित नहीं कर दिया गया है।
    • (4) अनुमोदन के बाद वह 6 माह तक लागू रह सकेगी और संसद् इस अवधि को एक बार में 6 माह तक बढ़ा सकेगी, किन्तु किसी भी दशा में उसे 3 वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकेगा।
      यदि उद्घोषणा जारी करते समय लोकसभा भंग कर दी गई है या खण्ड (3) में कथित 2 माह के दौरान वह भंग कर दी गई है, और राज्य सभा ने उसका अनुमोदन, संकल्प पारित करके कर दिया है, किन्तु लोकसभा ने इस अवधि के समाप्त होने के पहले ऐसा संकल्प पारित नहीं किया है, तो पुनर्गठित लोक सभा की पहली बैठक से 30 दिन समाप्त होने पर ऐसी उद्घोषणा प्रभावहीन हो जायगी, यदि लोक सभा ने संकल्प पारित करके इस अवधि के समाप्त होने के पहले उसका अनुमोदन नहीं कर दिया है.

    इसी प्रकार यदि किसी 6 माह की अवधि के दौरान, जिस अवधि तक के लिये संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित होने पर ऐसी उद्घोषणा लागू रह सकती है लोकसभा विघटित हो जाती है और इस अवधि के अन्दर उसके आगे जारी रहने का अनुमोदन राज्यसभा ने तो कर दिया है, किन्तु लोक सभा ने नहीं किया है, तो यदि दूसरी पुनर्गठित लोक सभा अपनी पहली बैठक से एक माह के अन्दर उसका अनुमोदन नहीं करती है, एक माह बीतने पर वह उद्घोषणा प्रभावहीन हो जायगी.

    • (5) खण्ड (3) के अन्तर्गत अनुमोदित उद्घोषणा को खण्ड (4) के उपबन्धों के बावजूद उसके जारी किये जाने के एक वर्ष के बाद आगे जारी रखने का कोई भी संकल्प संसद के किसी भी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जायगा, जब तक कि-
      (क) ऐसा संकल्प पारित करते समय कोई आपात उद्घोषणा सारे भारत में या उस राज्य के सम्पूर्ण या किसी एक भाग में लागू हो.
      (ख) निर्वाचन आयोग ने यह प्रमाणित न कर दिया हो कि संकल्प में निर्दिष्ट अवधि तक उसे और आगे जारी रखना, सम्बन्धित राज्य की विधान सभा का आम चुनाव कराना कठिन होने के कारण आवश्यक है.

    संविधान (59वाँ संशोधन) अधिनियम, 1988 द्वारा अनुच्छेद 356 में संशोधन करके पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि को अधिकतम 3 वर्ष के लिए बढ़ा देने के लिए उपबन्ध किया गया है. 44वें संशोधन द्वारा लगाई गई दोनों शर्ते-

    • (1) आपात प्रवर्तन में है.
    • (2) चुनाव आयोग प्रमाण दे कि चुनाव करना सम्भव नहीं है; पंजाब के मामले में लागू नहीं होगी। पंजाब की विशेष स्थिति को देखते हुए ऐसा किया गया संसद में सरकार ने वचन दिया है. कि यह संशोधन केवल पंजाब में ही लागू किया जायेगा और इसका दुरुपयोग नहीं किया जायेगा. इस प्रकार का वादा सरकार ने पिछली बार भी किया था, किन्तु सभी जानते हैं कि आपात् शक्ति का सरकार द्वारा दुरुपयोग किया गया.

    उद्घोषणा का प्रभाव

    अनुच्छेद 357 के अनुसार, जहाँ अनुच्छेद 356 (1) के अन्तर्गत जारी की गई उद्घोषणा में यह घोषित किया गया हो कि राज्य के विधानमण्डल की शक्तियों संसद के प्राधिकार या उसके अधीन प्रयोग की जाने योग्य होंगी, वहाँ

    • (क) संसद, राष्ट्रपति को कानून बनाने के लिये राज्य विधान मण्डल की शक्तियाँ प्रदान कर सकेगी और उसे अपनी इस शक्तियों को, ऐसी किन्हीं शर्तों के अधीन, जैसा कि वह उचित समझे किसी भी अन्य प्राधिकारी को, जिसको वह इस हेतु निर्दिष्ट करे, प्रत्यायोजित करने के लिये प्राधिकृत कर सकेगी.
    • (ख) संसद या राष्ट्रपति या अन्य प्राधिकारी, जिसमें कानून बनाने की ऐसी शक्ति निहित है. कानून बनाकर संघ को या उसके पदाधिकारियों और प्राधिकारियों को शक्तियाँ और कर्तव्य प्रदान और आरोपित कर सकेंगे या शक्तियों और कर्तव्यों को प्रदान या आरोपित करने के लिए प्राधिकृत कर सकेंगे.
    • (ग) राष्ट्रपति उस समय जब कि लोकसभा सत्र में न हो, राज्य को संचित निधि में, से संसद द्वारा ऐसे खर्च की मंजूरी के लम्बित रहते, खर्च प्राधिकृत कर सकेगा.

    (2) राज्य-विधान मण्डल की शक्ति के प्रयोग में खण्ड (1) (क) के अधीन संसद या राष्ट्रपति या अन्य प्राधिकारी द्वारा बनाया गया कोई भी कानून, उद्घोषणा के समाप्त होने के बाद तब तक प्रभावशाली रहेगा, जब तक कि उसे किसी सक्षम विधान मण्डल या प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित निरसित या संशोधित न कर दिया गया हो.

    उपर्युक्त अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत भारत में, इस संविधान के लागू होने के बाद से अब तक विभिन्न राज्यों में अनेक बार राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है. किन्हीं मामलों में जैसे 1976 में तमिलनाडु की डी० एस० के० की सरकार को, और स्वयं अपनी कॉंग्रेसी सरकार को 1975 में, उत्तर प्रदेश में और 1976 में उड़ीसा में अपदस्थ करने के लिये इस अनुच्छेद के उपबन्धों का दुरुपयोग भी किया गया है.

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    सन् 1977 में जनता पार्टी की केन्द्रीय सरकार ने सामूहिक रूप से नौ राज्यों को कांग्रेसी या अन्य सरकारों को बतस्त करने के लिये वहाँ इस अनुच्छेद के अन्तर्गत राष्ट्रपति शासन लागू किया था. इनमें से राजस्थान सहित 6 राज्यों ने केन्द्र सरकार के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर किया था.

    राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ के ऐसे मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत केन्द्र सरकार द्वारा विधान सभाओं को भंग करने की शक्ति का प्रयोग संवैधानिक है. यह आवश्यक नहीं है कि राष्ट्रपति राज्यपाल की ही रिपोर्ट पर ऐसा करे. यदि वह अन्य किन्हीं कारणों से सन्तुष्ट है कि किसी राज्य में संविधान के अनुसार सरकार चलाना सम्भव नहीं है. तो वह राष्ट्रपति को उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सलाह दी सकती है और राष्ट्रपति इस सलाह को मानने के लिये बाध्य है.

    पुनः 1980 में मध्यावधि चुनाव होने पर कांग्रेस पार्टी के पुनः सत्ता में लौटने पर केन्द्रीय सरकार ने उसी प्रकार सामूहिक रूप से भी राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करके अनुच्छेद 357 का एक बार पुनः दुरुपयोग किया गया है. संविधान (59वाँ संशोधन) अधिनियम, 1988 द्वारा अनुच्छेद 359 में संशोधन करके आपात के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 को निलम्बित करने की राष्ट्रपति को शक्ति दी गयी है.

    3. वित्तीय आपात

    अनुच्छेद 360 के अन्तर्गत-

    1. यदि राष्ट्रपति को यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जिसमें भारत या उसके भाग का वित्तीय स्थापित्व या उसकी साख (Credit) खतरे में है, तो वह उद्घोषणा द्वारा उस बात की घोषणा कर सकेगा.
    2. उपर्युक्त उद्घोषणा को-
      (क) किसी बाद की उद्घोषणा द्वारा रद्द या परिवर्तित किया जा सकेगा.
      (ख) संसद के प्रत्येक सदन के सामने रखा जायना.
      (ग) वह दो माह बीतने पर प्रभावहीन हो जायगी, यदि इसके पहले, संसद के दोनों सदनों द्वारा संकल्प पारित करके उसे अनुमोदित नहीं कर दिया गया है, किन्तु यदि उद्घोषणा जारी करते समय लोकसभा विघटित कर दी गई है या कथित दो माह के दौरान उसे विघटित कर दिया गया है, यदि राज्य सभा ने संकल्प पारित करके उसका अनुमोदन कर दिया है, किन्तु लोकसभा ने इस अवधि के बीतने के पहले ऐसा संकल्प पारित नहीं किया है तो वह एक माह बीतने के बाद प्रभावहीन हो जायगी, यदि पुनर्गठित लोकसभा ने अपनी पहली बैठक से एक माह समाप्त होने के पहले उसका अनुमोदन नहीं कर दिया है.
    3. ऐसी किसी उद्घोषणा के जारी रहने के दौरान संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी भी राज्य को यह निर्देश देने; जैसा कि निदेश में निर्दिष्ट किया जाय, और वह (संह सरकार) अन्य ऐसे भी निदेश दे सकेगा जैसा कि इस प्रयोजन के लिये वह आवश्यक और पर्याप्त समझे.
    4. (क) ऐसे किसी निदेश में निम्नलिखित बातें भी शामिल की जा सकेगी.
      (i) राज्य सेवा में रत सभी या किन्ही वर्गों के व्यक्तियों के वेतन और भत्तों में कटौती करने के उपबन्ध.
      (ii) जिन-धन विधेयकों या अन्य विधेयकों को अनुच्छेद 207 लागू हो, उन्हें राज्य विधान मण्डल द्वारा पारित किये जाने के बाद राष्ट्रपति के विचार के लिये सुरक्षित करने का उपबन्ध। (ख) राष्ट्रपति संघ सेवा में रत व्यक्तियों, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन और भर्ती में कटौती करने का निदेश भी जारी कर सकेगा.

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