सम्पत्ति की अवधारणा : अर्थ, परिभाषा, प्रयोग, सिद्धान्त एवं प्रकार

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सम्पत्ति की अवधारणा : अर्थ, परिभाषा, प्रयोग, सिद्धान्त एवं प्रकार

सम्पत्ति की अवधारणा

प्रत्येक मानव के लिये सम्पत्ति बहुत महत्वपूर्ण है. सम्पत्ति मनुष्य के लिये आर्थिक आधार है. सम्पत्ति के बिना मनुष्य का आर्थिक अस्तित्व संकटमय है सम्पत्ति व्यक्ति के अधिकार की विषयवस्तु है. अर्जन करना मनुष्य की प्रकृति है तथा सम्पत्ति उसका प्रयोजन है. सम्पत्ति से सम्बन्धित कब्जा और स्वामित्व है. सम्पत्ति का सम्बन्ध दोनों से इस प्रकार है कि सम्पत्ति के बिना स्वामित्व और कब्जे की संकल्पना नहीं किया जा सकता है.

अर्थात सम्पत्ति के बिना स्वामित्व और स्वामित्व के बिना सम्पत्ति की अवधारणा व्यर्थ होती प्रतीत होती है. इसी प्रकार कब्जे का सम्बन्ध सम्पत्ति से है अतः सम्पत्ति वह है जिस पर कब्जा किया जाता हो. अर्थात किसी वस्तु पर कब्जा नहीं किया जा सकता यदि वह सम्पत्ति नहीं है.

नोक्स बनाम डन्कास्टर कोलियरीज, 1940 के वाद में कोर्ट ऑफ अपील ने कहा कि सम्पत्ति एक कला का नाम नहीं है.

भारतीय संविधान में 44वें संशोधन के पूर्व अनुच्छेद 19 (1) (f) में सम्पत्ति अर्जन, धारण और व्ययन मूल अधिकार था और अनुच्छेद 31 (1) (2) के विरुद्ध संरक्षण प्राप्त था. लेकिन संविधान में 44वाँ संशोधन करके अनुच्छेद 300-a जोड़ा गया जिसके अनुसार “किसी व्यक्ति को उसकी सम्पत्ति से विधि के प्राधिकार से ही वंचित किया जा सकता है अन्यथा नहीं.”

इस प्रकार 44वें संशोधन के परिणामस्वरूप अब सम्पत्ति का अधिकार सांविधानिक अधिकार रह गया और सम्पत्ति के अधिकार के उल्लंघन के लिये अनुच्छेद 32 एवं 226 के अन्तर्गत रिट नहीं फाइल किया जा सकता है. अब यह नागरिक एवं गैर नागरिक दोनों को प्राप्त हो गया |

सम्पत्ति का अर्थ एवं परिभाषा

जिस किसी वस्तु पर स्वामित्व का अधिकार होता है, उसे हम सम्पत्ति कहते हैं. अन्य शब्दों में सम्पत्ति उस वस्तु को कहते हैं जिस पर कोई मालिकाना हक प्राप्त करता है. कभी-कभी स्वामित्व के अधिकार को हम सम्पत्ति कहते हैं और कभी-कभी जबकि उस अधिकार का हम प्रयोग करते हैं, तब भी हम उसे सम्पत्ति कहते हैं |

सम्पत्ति का प्रयोग

निम्नलिखित भाव में हम सम्पत्ति का प्रयोग करते हैं-

1. सम्पूर्ण वैधानिक अधिकार

इसके अन्तर्गत व्यक्ति के वैधानिक अधिकार भी आते हैं, परन्तु इसका प्रयोग अब निरर्थक सिद्ध हो चुका है.

2. स्वत्वाधिकार

इसके अन्तर्गत व्यक्तिगत अधिकार नहीं आते वरन् साम्प्रत्तिक अधिकार ही आते हैं.

3. साम्पत्तिक स्वत्वाधिकार

इसके अन्तर्गत साम्पत्तिक एवं वास्तविक दोनों अधिकार आते हैं.

4. भौतिक सम्पत्ति

भौतिक वस्तु के स्वामित्व को भौतिक सम्पत्ति कहते हैं.

5. बौद्धिक सम्पत्ति

वर्तमान युग में बौद्धिक सम्पत्ति का विशेष महत्व है; जैसे- कॉपीराइट, ट्रेडमार्क्स आदि |

सम्पत्ति सम्बन्धी सिद्धान्त

1. प्राकृतिक सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार जो व्यक्ति सबसे पहले स्वामीहीन सम्पत्ति या वस्तु पर कब्जा करता है, सम्पत्ति उसकी हो जाती है. ब्लैकस्टोव ग्रोसियस ने इसका समर्थन किया. मेन ने इस सिद्धान्त को गलत माना.

2. राज्य ने ने सम्पत्ति की दृष्टि की

इस सिद्धान्त के अनुसार सम्पत्ति का स्त्रोत राज्य होता है. सम्पत्ति के उपभोग करने का अधिकार राज्य द्वारा ही दिया जाता है.

3. श्रम सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार सम्पत्ति श्रम का परिणाम होती है. जो वस्तु श्रम के बदले प्राप्त होती है, सम्पत्ति कहलाती है.

यह नियम भी अपूर्ण है. कभी-कभी. बिना श्रम के भी सम्पत्ति बढ़ जाती है जैसे जमीन की कीमत बढ़ना इत्यादि.

4. तत्व मीमांसीय सिद्धान्त

इसके अनुसार सम्पत्ति स्वतन्त्रता की बाह्य अभिव्यक्ति है. सम्पत्ति का नियन्त्रण मनुष्य को स्वतन्त्र रखता है. आत्मसिद्धि के लिये सम्पत्ति आवश्यक होती है.

5. ऐतिहासिक सिद्धान्त

सम्पत्ति की संख्या में विस्तार विकास की प्रक्रिया के माध्यम से हुआ. व्यक्तिगत सम्पत्ति का विकास समष्टि सम्पत्ति के बाद हुआ.

समष्टि सम्पत्ति वितरित होने के दो तरीके हैं-

  1. बंटवारा.
  2. स्वार्जित सम्पत्ति.

6. मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त

वस्तुओं को इकट्ठा करना या उन पर नियन्त्रण रखना मनुष्य की स्वाभाविक आदत होती है और इसी से आदत या प्रवृत्ति की उत्पत्ति हुई. व्यक्तिगत सम्पत्ति पर नियन्त्रण सामान्य है और यह सहज प्रकृति की ओर इंगित करता है.

7. क्रियात्मक सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार सम्पत्ति के प्रति विचार सम्पत्ति के कृत्य एवं सामाजिक प्रभावों के विश्लेषण के आधार पर किया जाता चाहिये.

निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि कोई भी सिद्धान्त अकेला पूर्ण रूप से साथ नहीं है. प्रत्येक सिद्धान्त का अपने दृष्टिकोण से महत्व है |

सम्पत्ति के प्रकार

सम्पत्ति दो प्रकार की होती है- मूर्त (Corporeal) तथा अमूर्त (Incorporeal).

1. मूर्त सम्पत्ति

भौतिक वस्तुओं पर स्वामित्व के अधिकार को मूर्त सम्पत्ति कहते हैं. यह वह सम्पत्ति है जिसकी अनुभूति ज्ञानेन्द्रियों द्वारा की जा सकती है; जैसे भूमि, मकान, रुपये, पैसे आदि.

मूर्त सम्पत्ति को दो भागों में बांटा जाता है- चल सम्पत्ति (Movable property) तथा अचल सम्पत्ति (Immovable property).

2. अमूर्त सम्पत्ति

मानव वर्ग के विरुद्ध प्राप्त होने वाले अन्य साम्पत्तिक सर्वबन्धी अधिकार अमूर्त सम्पत्ति कहलाते हैं. इस सम्पत्ति को ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता है.

इसे दो भागों में बाँटा गया है-

1. पर-साम्पत्तिक अधिकार

इसमें निम्नलिखित को सम्मिलित किया गया है- पट्टा (Lease), सुविधाभार (Servitude), प्रतिभूतियाँ (Securities), न्यास (Trust).

2. अभौतिक वस्तुओं पर निज साम्पत्तिक अधिकार

इसमें निम्नलिखित को शामिल किया गया है- पेटेन्ट, कॉपीराइट, साख (Goodwill) |

सम्पत्ति प्राप्त करने की विधियां

सम्पत्ति प्राप्त करने की निम्नलिखित विधियां हैं-

1. कब्जा द्वारा

आधिपत्य स्वत्व की घोषणा करता है. किसी व्यक्ति का आधिपत्य अमुक वस्तु पर उसकी अपेक्षा अच्छा हो सकता है, परन्तु वास्तविक स्वामी से बढ़िया नहीं. ऐसी स्थिति में प्राप्तकर्ता का अधिकार अपूर्ण कहलाता है और वास्तविक स्वामी का अधिकार पूर्ण कहलाता है.

यदि कोई आदमी जो कि किसी वस्तु का आधिपत्य ग्रहण किये हुए है और उसको आधिपत्य से हटाया है तो वह व्यक्ति पुनः आधिपत्य प्राप्त कर सकता है. प्रथम तरह का चिरभोग अधिकार का सृजन करता है. दूसरा समय बीतने के साथ विनष्ट हो जाता है.

2. भोगाधिकार द्वारा

समय बीतने के साथ-साथ ऐसे अधिकारों का प्रादुर्भाव होता है और उसी के साथ इनका जन्म होता है तथा विनाश हो जाता है.

ये दो प्रकार के होते हैं- पहला प्राप्त करने का अधिकार, या दूसरा समाप्त करने का अधिकार. पहला तो समय के साथ ही उत्पन्न होता है, जैसे रास्ते में आने-जाने का अधिकार जो कि 20 वर्ष तक बिना रुकावट के होता है और दूसरा वह होता है जो कि समय व्यतीत हो जाने पर समाप्त हो जाता है, जैसे कि किसी ऋण हेतु समय के भीतर दावा करना आदि.

3. अनुबन्ध

अनुबन्ध (Agreement) सम्पत्ति पर अधिकार प्राप्त करने या समाप्त करने का एक महत्वपूर्ण पत्र होता है. अनुबन्ध, जो कि अधिकारों का प्रादुर्भाव करते हैं, दो तरह के होते हैं- अभिहस्तांकन (Assignments) तथा अनुदान (Grants).

ये अनुबन्ध जिनके द्वारा स्वामित्व एक से दूसरे के पास जाता है ‘अभिहस्तांकन’ कहलाते हैं और जो अनुबन्ध नवीन अधिकारों को जन्म देते हैं और स्वामी को स्वामित्व अभिभारस्वरूप मिलता है, उसे हम ‘अनुदान’ कहते हैं, जैस- क्रय करना ‘अभिहस्तांकन’ कहलाता है और पट्टा करना’ अनुदान’ कहलाता है.

4. उत्तराधिकार

उत्तराधिकार दो तरह का होता है- निर्वसीयती उत्तराधिकार तथा वसीयती उत्तराधिकार.

उत्तराधिकार द्वारा सम्पत्ति का अधिकार प्राप्त होता है. क्योंकि सम्पत्ति का अधिकार तो व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी बना रहता है वही अधिकार विरासत में दूसरे को मिलता है तो उस व्यक्ति को वह सम्पत्ति का अधिकार प्राप्त हो जाता है |

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