भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के लिये संविधान में विहित प्रक्रिया?

भारत के राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होता है?

राष्ट्रपति पद का चुनाव

संविधान के अनुच्छेद 55; भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के लिये निम्नलिखित प्रक्रिया विहित करता है-

  1. राष्ट्रपति के चुनाव में जहाँ तक सम्भव हो, विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापक्रम में एकरूपता होगी।
  2. राज्यों में आपस में ऐसी एकरूपता तथा समस्त राज्यों और संघ के बीच बराबरी भी, प्राप्त करने के लिये संसद तथा प्रयेक राज्य की विधान सभा का प्रत्येक निर्वाचित सदस्य इस निर्वाचन में निम्नलिखित प्रकार से निर्धारित संख्या में देने का हकदार होगा-
  • क) किसी राज्य की विधान सभा का प्रत्येक निर्वाचित सदस्य उतने मत देगा जो सम्पूर्ण जनसंख्या को नियोजित सदस्यों की संख्या से भाग देने पर जो भागफल उसे पुनः 1000 की संख्या से भाग देने पर जो भागफल प्राप्त हो;
  • ख) यदि इस प्रकार भागफल प्राप्त करने पर 500 या उससे अधिक शेष बचता है, तो उपर्युक्त रीति से प्राप्त मतों में एक मत जोड़ दिया जायेगा:
  • ग) संसद के प्रत्येक सदन का प्रत्येक निर्वाचित सदस्य उतने ही मत देगा जो उपर्युक्त उपखण्डों (क) और (ख) के अधीन राज्यों की विधान सभाओं के सदस्यों के लिए नियत सम्पूर्ण मतों की संख्या को संसद के दोनों सदनों के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग देने से प्राप्त हो। यदि भिन्न आधे से अधिक है तो उसे एक गिना जायगा तथा अन्य भियों को छोड़ दिया जायगा।
  • राष्ट्रपति का चुनाव एकल संक्रमणीय समानुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति के अनुसार किया जायगा और गुप्त मतदान की प्रणाली से मतदान किया जायगा |

राष्ट्रपति के चुनाव की विधि

स्पष्टीकरण के अनुसार, ‘जनसंख्या’ का अर्थ वह जनसंख्या होगी जो इस चुनाव के पूर्व अन्तिम जनगणना में प्रकाशित की जा चुकी हो। किन्तु जब तक सन् 2000 के बाद की जाने वाली पहली जनगणना में निधारित जनसंख्या के आँकड़े प्रकाशित नहीं होते तब तक सन् 1971 की जनगणना में प्राप्त जनसंख्या को ऐसी जनसंख्या के अर्थ में लिया जायगा।

उपर्युक्त रीति से निर्धारित मतों की संख्या को आसानी से समझने के लिये, एक भिन्न के रूप में, निम्नलिखित प्रकार से दिखाया जा सकता है-

  1. राज्य की विधान सभा के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य को प्राप्त मतों की संख्या = राज्य की जनसंख्या/विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या /1000
  2. प्रत्येक निर्वाचित संसद सदस्य को प्राप्त मतों की संख्या = राज्यों के विधान सभाओं के कुल मतों की संख्या/संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या |

राष्ट्रपति के चुनाव के लिये विहित योग्यता

राष्ट्रपति के चुनाव के लिये अनुच्छेद 58 के अनुसार, किसी व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यतायें होना चाहिये-

  1. वह भारत का नागरिक हो;
  2. वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
  4. वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन या इन किन्हीं सरकारों द्वारा नियन्त्रित किसी स्थानीय या अन्य अधिकारी के अधीन कोई ‘लाभ का पद धारण न किये हुए हो। “राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति निर्वाचन (संशोधन) अधिनियम, 1974″ के अनुसार यह कभी आवश्यक है कि राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिये उम्मीदवार के नाम को कम से कम 10 मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित और 10 मतदाताओं द्वारा समर्पित होना चाहिए।

‘लाभ का पद’ स्पष्टीकरण के अनुसार राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, किसी राज्य का राज्यपाल या कोई केन्द्रीय मन्त्री या किसी राज्य का कोई मन्त्री लाभ का पद धारण किये हुए नहीं समझा जायगा |

राष्ट्रपति पद की अवधि क्या है?

भारत के राष्ट्रपति का चुनाव कब होगा? राष्ट्रपति पद की अवधि अनुच्छेद 56 के अनुसार, राष्ट्रपति अपने पदग्रहण की तारीख से 5 वर्ष की अवधि तक के लिये पद धारण करता है, किन्तु-

  1. वह उपराष्ट्रपति को सम्बोधित करते हुए लिखित में अपने हस्ताक्षर से अपने पद से त्यागपत्र दे सकेगा. जिसको उपराष्ट्रपति तुरन्त लोक सभाध्यक्ष को संसूचित करेगा,
  2. उसे, संविधान के उल्लंघन के लिये, अनुच्छेद 61 में उपबन्धित ढंग से महाभियोग द्वारा उसके पद से हटाया जा सकेगा,
  3. अपनी अवधि समाप्त हो जाने पर भी वह तब तक पद धारण किये हुए रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी उसका पद ग्रहण नहीं करता है |

निर्गामी राष्ट्रपति को दोबारा चुनाव के लिये पात्रता

जो भी व्यक्ति राष्ट्रपति का पद धारण करता है, अपनी अवधि समाप्त होने पर या जिसने यह पद पहले कभी धारण किया है, अनुच्छेद 57 के अन्तर्गत, दोबारा चुनाव के लिये पात्र होगा। अनुच्छेद 57 उसे दोबारा चुनाव की पात्रता बहाल करके उस पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध आरोपित नहीं करता है कि वह कितनी बार इस पद के चुनाव के लिये पात्र रहेगा। अस्तु वह अनेक बार इस पद का चुनाव लड़ सकता है और निर्वाचित किया जा सकता है. अमेरिकी संविधान में कोई व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति पद के लिये निर्वाचित नहीं किया जा सकता है [22वाँ संशोधन द्वारा]। इस संशोधन के पहले वहाँ भी कोई प्रतिबन्ध नहीं था और अब्राहम लिंकन तीन बार लगातार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे।

भारत में यद्यपि दोबारा निर्वाचन सम्बन्धी कोई प्रतिवन्ध नहीं है, फिर भी अभी तक स्थापित परम्परा के अनुसार, किसी भी राष्ट्रपति ने दोबारा चुनाव लड़ने की इच्छा तक जाहिर नहीं की है. राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने भी वह जाहिर कर दिया था कि वह 1982 में अपनी अवधि समाप्त होने के बाद दोबारा चुनाव लड़ने के लिये इच्छुक नहीं है |

राष्ट्रपति पद के साथ जुड़ी हुई शर्ते

अनुच्छेद 59 के अनुसार-

  1. राष्ट्रपति न तो संसद के किसी सदन का सदस्य होगा और न किसी राज्य के विधान मण्डल का ही सदस्य होगा और यदि संसद के किसी भी सदन का सदस्य या किसी राज्य के विधान मण्डल का सदस्य राष्ट्रपति चुना जाता है, तो यह समझा जायगा कि जिस तारीख को वह राष्ट्रपति का पद ग्रहण करता है उस तारीख से उस सदन की उसकी सदस्यता समाप्त हो गई है, या उसका स्थान रिक्त हो गया है।
  2. राष्ट्रपति अन्य कोई भी लाभ का पद धारण नहीं करेंगे।
  3. राष्ट्रपति को बिना किराया दिये अपने पदीय निवासों के उपयोग का हक होगा और वह उन उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकार का भी हकदार होगा जो संसद कानून बनाकर निर्धारित करे और जब तक ऐसा कोई उपवन्ध नहीं किया जाता है, तब तक वह द्वितीय अनुसूची में उल्लिखित उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों के लिये हकदार होगा।
  4. राष्ट्रपति की उपलब्धियों और भत्ते उसके पद की अवधि के दौरान घटाये नहीं जायेंगे।

अनुच्छेद 60 के अनुसार-

प्रत्येक राष्ट्रपति और प्रत्येक व्यक्ति, जो राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा है अथवा उसके कृत्यों का निर्वहन कर रहा है, अपने पद-ग्रहण से पूर्व भारत के मुख्य न्यायाधिपति अथवा उसकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के उपबन्ध वरिष्ठतम न्याधिपति के सामने निम्नलिखित शपथ लेगा और उस पर अपना हस्ताक्षर करेगा-

“मैं (नाम) ईश्वर की शपथ लेता हूँ। (या) सत्यनिष्य से प्रतिज्ञान कर हूँ कि मैं श्रद्धापूर्वक भारत को राष्ट्रपति पद का कार्य-पालन (अथवा राष्ट्रपति के नृत्यों का निर्वहन) करूँगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूँगा और मैं भारत की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहूँगा” |

राष्ट्रपति का पद आकस्मिक रूप से कब रिक्त होता है?

राष्ट्रपति का पद आकस्मिक रूप से निम्नलिखित दशाओं में रिक्त हो जाता है-

  1. जब उसकी मृत्यु हो जाती है।
  2. जब वह अपने पद से त्याग-पत्र दे देता है (अनुच्छेद 56)।
  3. जब अनुच्छेद 61 के अधीन उस पर महाभियोग चला कर उसे हटा दिया जाता है (अनुच्छेद 56)।
  4. अन्यथा (अनुच्छेद 62, 65), अर्थात् जब उसका चुनाव उच्चतम न्यायालय द्वारा शून्य घोषित कर दिया जाता है [अनु० 71 (2)] |

राष्ट्रपति के रिक्त पद कैसे भरा जाता है?

अनुच्छेद 65 के अनुसार उपर्युक्त आकश्मिक कारणों से राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर उपराष्ट्रपति तक तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता रहेगा जब तक कि नया राष्ट्रपति, इस रिक्त पद के भरने के लिये इस संविधान के अनुसार कराये गये चुनाव में निर्वाचित होकर अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है। ऐसे चुनाव के लिये अनुच्छेद निम्नलिखित उपबन्ध करता है-

  1. जब राष्ट्रपति के पद की अवधि समाप्त होने के कारण पद रिक्त होने वाला हो; तब उसका निर्वाचन ऐसी अवधि के समाप्त होने के पहले कराया जायगा।
  2. जब राष्ट्रपति का पद, उसकी मृत्यु, या त्यागपत्र या उसके हटाये जाने के कारण या अन्यथा, रिक्त हो, तब ऐसी रिक्तता के बाद जहाँ तक सम्भव हो शीघ्र, किन्तु किसी भी दशा में 6 माह तक में चुनाव कराया जायगा और निर्वाचित व्यक्ति अपने पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष की पूरी अवधि तक के लिये राष्ट्रपति का पद धारण करने का हकदार होगा |

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