राज्य आयोग का गठन एवं क्षेत्राधिकार

राज्य आयोग का गठन एवं क्षेत्राधिकार

राज्य आयोग का गठन

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 16 के अनुसार, राज्य आयोग का गठन, अध्यक्ष तथा दो सदस्यों, जिनमें एक महिला सदस्य, से होगी. अर्थात राज्य आयोग में अध्यक्ष को मिलाकर कम से कम तीन सदस्य होते हैं |

योग्यता

अध्यक्ष के लिए ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जा सकता है. जो कि उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या रह चुका हो. अध्यक्ष की नियुक्ति के सम्बन्ध में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से राय लिये बगैर कोई नियुक्ति नहीं की जायेगी. उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के अनुसार सदस्यों की संख्या दो से कम नहीं और जैसा कि उपबन्धित किया जाए उससे अधिक नहीं, उनमें से एक महिला होगी, जो निम्न योग्यताएं रखते हों-

  1. जिनकी आयु 35 वर्ष से कम न हो;
  2. मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि धारित करते हों; और
  3. जो योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति होंगे और जिनको अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक कार्य या प्रशासन से सम्बन्धित समस्याओं सम्बन्धी व्यवहार का पर्याप्त ज्ञान और कम से कम 10 वर्ष का पर्याप्त अनुभव हो:

परन्तु यह कि न्यायिक पृष्ठभूमि धारित करने वाले व्यक्ति सदस्यों के 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होंगे.

इस खण्ड के प्रयोजन के लिए पद “न्यायिक पृष्ठभूमि धारित करने वाले” व्यक्ति का अर्थ होगा ऐसे व्यक्ति जिन्हें जिला स्तर के न्यायालय या समान स्तर के किसी अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में कम से कम 10 वर्ष का अनुभव व ज्ञान हो;

परन्तु आगे यह भी कि व्यक्ति सदस्य के रूप में नियुक्ति हेतु अयोग्य होगा यदि वह-

  1. किसी अपराध में जो राज्य सरकार के अभिमत में नैतिक अधमता (Moral upitude) से सम्बन्धित हो, कारावास के दण्ड हेतु दोषसिद्ध ठहराया जा चुका हो या
  2. एक अनुन्मोचित दिवालिया (Undischarged insolvent) हो या
  3. विकृतचित (Unsound mind) का हो, और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया गया हो; या
  4. शासन या शासन के स्वामित्व की या उसके द्वारा नियंत्रित निगमित निकाय की सेवा से हटाया या निलम्बित किया जा चुका हो; या
  5. राज्य सरकार के अभिमत में ऐसे वित्तीय या अन्य हित रखता हो, जिनसे सदस्य के रूप में उसके कर्तव्य निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना सम्भावित हो; या
  6. ऐसी कोई अन्य अयोग्यता रखता हो जैसी कि राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए.

ऐसी प्रत्येक नियुक्ति निम्न सदस्यों से मिलकर गठित चयन समिति के अनुमोदन पर राज्य सरकार द्वारा की जायेगी, अर्थात-

  1. राज्य आयोग का अध्यक्ष-अध्यक्ष;
  2. राज्य के विधि विभाग का सचिव-सदस्य;
  3. राज्य में उपभोक्ता संबंधी मामलों के विभाग के प्रभार में होने वाला सचिव-सदस्य.

परन्तु यह कि जहां राज्य आयोग का अध्यक्ष अनुपस्थिति या अन्य कारण से चयन समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने में असमर्थ हों वहाँ राज्य सरकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को उस उच्च न्यायालय के किसी आसीन न्यायाधीश को नामांकित किये जाने हेतु मामले को निर्दिष्ट कर सकेगी।

  1. राज्य आयोग का न्याय क्षेत्र, शक्तियाँ और प्राधिकार उसकी न्याय पीठों द्वारा प्रयुक्त किये जा सकेंगे।;
  2. न्यायपीठ अध्यक्ष और एक या अधिक सदस्यों, जैसा भी अध्यक्ष ठीक समझे, से गठित हो सकेगी.
  3. यदि न्यायपीठ के सदस्यों में किसी बिन्दु पर मतभेद है तब वह बिन्दु यदि वहाँ बहुमत हो तो बहुमत की राय से निर्धारित किया जाना चाहिए, किन्तु यदि सदस्य समान रूप से विभाजित हों तब उन्हें बिन्दु या बिन्दुओं का उल्लेख करना चाहिए जिन पर उनमें मतभेद है, और अध्यक्ष को निर्दिष्ट किया जाना चाहिए जो उस बिन्दु या बिन्दुओं पर या तो स्वयं सुनवाई करेगा या ऐसे बिन्दु या बिन्दुओं पर मामले की सुनवाई एक या अधिक या अन्य सदस्य द्वारा की जा रही ऐसे बिन्दु या बिन्दुओं पर सुनवाई करने वाले सदस्यों, जिनमें वे सदस्य भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने आरम्भ में सुनवाई की थी, के बहुमत के मतानुसार, निर्णीत किया जायेगा |

कार्यकाल

आयोग के सदस्य का कार्यकाल, 5 वर्ष, या 67 वर्ष तक की आयु या दोनों में से जो भी पहले हो, तक का होगा. कोई भी सदस्य दोबारा नियुक्ति की भी पात्रता रखता है |

राज्य आयोग का क्षेत्राधिकार

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 17 के तहत राज्य आयोग को निम्नलिखित क्षेत्राधिकार प्राप्त है:

आर्थिक अधिकारिता

आर्थिक अधिकारिता (Pecuniary Jurisdiction) के अन्तर्गत राज्य आयोग ऐसे परिवादों की सुनवाई कर सकता है जिनमें परिवादित माल या सेवाओं अथवा दावाकृत प्रतिकर का मूल्य बीस लाख से अधिक किन्तु एक करोड़ रुपये से अधिक न हो. उल्लेखनीय है कि सन् 2002 के उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम से पूर्व यह अधिकारिता 5 लाख से 20 लाख रुपये तक की थी.

प्रादेशिक अधिकारिता

राज्य आयोग की अधिकारिता का विस्तार सम्पूर्ण राज्य पर है अर्थात उद्भूत मामलों की वह सुनवाई कर सकता है.

शिवचरण बनाम गंगाराम एण्ड सन्स (AIR 2000 S.C. at page 1987) में यह धारित किया गया है कि राज्य आयोग के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार सम्बन्धी प्रावधानों को धारा 11(2) के प्रावधानों के तहत पढ़ा जाना चाहिए.

तथ्य या विधि के कठिन या जटिल प्रश्न होने के आधार पर राज्य आयोग की अधिकारिता से इन्कार नहीं किया जा सकता है.

अपीलीय अधिकारिता

अपीलीय अधिकारिता (Appellate Jurisdiction) के अन्तर्गत राज्य आयोग राज्य के किसी भी जिला फोरम के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई कर सकता है.

पुनरीक्षण अधिकारिता

राज्य आयोग को पुनरीक्षण (Revision) की शक्तियाँ भी प्रदान की गई हैं. जहाँ राज्य आयोग को यह प्रतीत हो कि-

  1. जिला फोरम ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो उनमें निहित नहीं है, या
  2. जिला फोरम ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा हो जो उसमें निहित है, या
  3. जिला फोरम ने अपनी अधिकारिता का प्रयोग अवैध रूप से या तात्विक अनियमितता से किया है;

वहां आयोग ऐसे अभिलेखों को अपने पास मँगवा सकेगा और उनमें समुचित आदेश पारित कर सकेगा.

उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 द्वारा संशोधित प्रावधान के अनुसार, परिवाद ऐसे राज्य आयोग में संस्थापित किया जायेगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर-

  1. विरोधी पक्षकार, या जहां एक से अधिक विरोधी पक्षकार हैं वहां विरोधी पक्षकारों में से प्रत्येक परिवाद के संस्थित किए जाने के समय वस्तुत और स्वेच्छापूर्वक निवास करता है या कारवार चलाता है या शाखा कार्यालय है या व्यक्तिगत रूप से अभिलाभ के लिए स्वयं कार्य करता है; या
  2. कोई विरोधी पक्षकार, जहां एक से अधिक विरोधी पक्षकार हों, परिवाद संस्थित किये जाने के समय वस्तुतः और स्वेच्छापूर्वक निवास करता है या कारबार करता है या शाखा कार्यालय है या व्यक्तिगत रूप से अभिलाभ के लिए कार्य करता है, परन्तु ऐसे कार्य में यदि जिला फोरम ने इजाजत दे दी है या विरोधी पक्षकार जो वहां न निवास करता है या न ही कारवार चलाता है और न व्यक्तिगत रूप से अभिलाभ के लिए कार्य करता है, जैसा भी हो उस बाद में सम्मिलित हो वे ऐसे संस्थित किये जाने के लिए उपमत हो गये हैं; या
  3. वादहेतुक पूर्णत: या भागत: पैदा होता है.

मामलों के अन्तरण की शक्ति

उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के द्वारा जोड़ी गई नई धारा 17 (A) के अनुसार, राज्य आयोग परिवादी के आवेदन पर या स्वप्रेरणा से न्यायहित में किसी मामले को प्रक्रिया के किसी भी प्रक्रम पर एक जिला फोरम में अन्तरित कर सकता है.

धारा 17 (B) के अनुसार, राज्य आयोग सामान्यतः राज्य की राजधानी में कार्य करेगा परन्तु ऐसे अन्य स्थानों पर भी अपना कार्य कर सकेगा जहां राज्य सरकार, राज्य आयोग के परामर्श से, समय-समय पर राजपत्र में अधिसूचित करे.

धारा 18 के अनुसार, धारा 12, धारा 13 और धारा 14 और उसके अधीन बनाए गए नियमों के प्रावधान जिला फोरम द्वारा परिवादी के निपटारे के लिए विहित प्रक्रिया ऐसे उपांतरणों सहित, जो आवश्यक हों, राज्य आयोग द्वारा विवादों के को लागू होगी.

सुजीत कुमार नन्दी बनाम रामकृष्ण मिशन सेवा प्रतिष्ठान उर्फ शिशु मंगल हॉस्पिटल (AIR 2012 NOC 164 कलकत्ता) के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि-उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में सामान्यतः साक्षी से प्रतिपरीक्षा करने का कोई प्रावधान नहीं है. फिर भी यदि परिवादी को साक्षी से प्रतिपरीक्षा करने के दो अवसर प्रदान किये जाने पर भी उसने इसका लाभ नहीं उठाया हो तो उसे अब प्रतिपरीक्षा से इन्कार किया जाना न्यायोचित है |

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